मौन स्वीकृति  है हमारी सहमति की,
मौन गवाह है हमारी सहनशीलता की!
कभी -कभी कुछ ना कहते हुए भी बहुत कुछ कहा जा सकता है,
यह अभिव्यक्ति है हमारीअसहमत होते हुए भी सहमति दिखाने की,
मौन हमारी कमजोरी नही ताकत है,
बोलना तो सबको आता है,पर कहां कया है बोलना ये हमे मौन सिखाता है!
मौन समय है स्वाध्याय करने का,मौन अहसास है शब्दो का चयन करने का!
कुछ ना कहते हुए भी जो सब कह जाता है,इंसान वही संपूर्ण कहलाता है!
बोलना आना ज़रूरी नही,जरूरी है चयन शब्दो का,
और चयन भी ऐसा,जो मस्तिष्क से उतरकर सीधा दिल मे घर कर जाता है!
कभीं-कभी मौन मे वो कहने की ताकत होती है जो भारी-भरकम शब्द भी नही कह पाते है!
       
                                  श्वेता अरोडा