थाम लो हाथ मेरा ओ कन्हैया,
विरह की लपटों से जल रही हूँ।
खड़ी हूँ आज भी उसी जगह पर,
तेरा इंतजार कर रही हूँ।
सूना-सूना मन मेरा हो गया है,
तेरे बिन ओ सांवले।
आजा तू लौट कर,
अब तो मेरा हाथ थाम ले।
अशांत सा है मन मेरा,
कोई अविलम्ब दिखाई नही देता है।
बिन तेरे ओ मनमोहन,
ये सावन भी सुकूँ नही देता है।
विरह की अपनी व्यथा,
कैसे कहूँ मैं तुमसे।
राह निहारते है थके मेरे नैन,
पूछते है  मुझसे।
गोकुल की गली-गली,
तेरे बिन सूनी है।
बेरंग हुए फागुन अब,
बेचैन भी सजनी है।
अंतर्मन की खिड़कियों से झांककर देखती हूँ।
आएगा मेरा कन्हैया कभी तो हाथ थमने मेरा,
ऐसा स्वप्न देखती हूँ।।

@शीला द्विवेदी "अक्षरा"