कभी खामोशी को भी समझ लिया जाता था,
अब शब्दो के अर्थ भी खोने लगे!
कभी परायो को भी गले लगाया जाता था,
अब अपनो के अर्थ भी पराए लगे!
कभी मिल-बांट कर खा लिया जाता था,
अब छीन कर खाने वालो के नंबर बढे!
कभी खुशी मे दूसरो की खुश हो लिया करते थे,
अब अपनो की खुशियो से भी दिल जले!
कभी दूसरो के अंधेरे घरो मे उजाला कर दिया जाता था,
अब अपनी के हाथो ही अपने घरो के चिराग बुझे!
खंजर तो बहुत खाए सीने मे भी,पर दुख हुआ तब,
जबपीठ मे खंजर अपनो के हाथो पडे!
कल्पना कया करेअब निस्वार्थ रिश्तो की,
कयंकि हर रिशते के ही अर्थ जब खोने लगे!
श्वेता अरोडा

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