वक़्त की साजिशों का ही तो दौर है
जो हाथ से रेत की तरह खुबसूरत
लम्हें फिसलते चले गए।
जिंदगी की किताब ने इतना धैर्य
दिया की हर पहलू में खुशी ढूँढते
चले गए।
न हमनें ख्वाहिशें दफ़न किया और
न हालातों से समझौता किया,
कदमों का साथ न होकर भी, बिखरे पलों में
भी साथ निभाते चले गए।
अपने हर एहसास से तुमने मुझे छूकर
मुक्कमल बना दिया, दुख के
छाए बादल मे भी हम
हर फिक्र को धुंए में उड़ाते चले गये।
स्वरचित्
सुनीता ओझा

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