मित्रता होती है दो समान विचारों वाले व्यक्ति में।
उदार हृदय परोपकारी भाव एवं निस्वार्थ प्रेम में।।
देना ही देना न लेना कभी गुणों को बढ़ाना अवगुणों को दूर करना।
जान हथेली पर रखकर दोस्त का जीवन बचाना और किए उपकार को भूल जाना।।
मित्रता मिलती है भाग्य से सही जो प्रेम से न बीच में आए अहंकार और स्वार्थ।
प्रेम अथाह प्रेम करो मित्रता प्रकृति से जो सिर्फ देती है।।
करो मित्रता नदियों से जिन का जल कभी दूषित न करो।
करो मित्रता वृक्षों से जो देते हैं जीवन और फल ना काटो जो देते हैं प्राणवायु।।
करो मित्रता पर्वतों से न छलनी करो उनका सीना।
करो मित्रता आकाश से जो असीम है अनंत है हर पल बाहों में भरे रहता है।।
मित्रता करो ईश्वर से जो बिना मांगे सब देता है और हर पल रखता है ख्याल।
मित्रता करो प्रकृति के हर कण-कण से जीवन निर्मल निष्छल बने।।
स्वरचित मौलिक अप्रकाशित सर्वाधिकार युक्त डॉक्टर आशा श्रीवास्तव जबलपुर

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