सपने। क्या होते हैं सपने ? सपनों की दुनिया बहुत ही हसीन है। सपने बुनना, उन्हें पूरा करना एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। बच्चे जब जन्म लेते हैं तो बचपन में सपने बुनना आरंभ कर देते हैं और उन्हें पूरा करने की ख्वाब देखने लगते हैं। वक्त के साथ-साथ कुछ के सपने पूरे हो जाते हैं और कुछ अपने सपनों की मंजिल को पाने के लिए हमेशा प्रयासरत रहते हैं। ऐसी ही एक कहानी एक स्वावलंबी लड़की जीविका की जिसका सौंदर्य, सीरत और पढ़ाई में कोई मुकाबला नहीं था। वह शुरुआत से ही अपनी कक्षा में अव्वल आती थी और काम में माता-पिता का हाथ भी बटाती। धीरे-धीरे वह बड़ी हो गई और उसका दाखिला कॉलेज में हो गया। उसके मां-बाप गांव में रहते थे। वह रोज गांव से दूर पैदल चलकर अपने कॉलेज के लिए जाती थी। वह कॉलेज में भी पढ़ाई में हमेशा आगे रहती थी जिस कारण सभी लड़के लड़कियां उससे दोस्ती करना चाहते थे और उससे नोट्स के लिए मदद भी मांगते। वैसे तो वह किसी के साथ ज्यादा संबंध नहीं रखती और हमेशा अपनी पढ़ाई में ध्यान लगाती परंतु किसी मदद के लिए भी मना करती। उसी के कॉलेज का लड़का करण भी उससे बहुत प्रभावित था। वह उससे दोस्ती करना चाहता था।
इस साल गांव में खेती की फसल अच्छी ना होने के कारण पिताजी को कॉलेज की फीस भरने में देर हो गई। शिक्षक भी बार बार उसको फीस के लिए टोक देते। करण को जैसे ही जीविका की फीस के बारे में ज्ञात हुआ, उसने ऑफिस में जाकर उसकी फीस जमा कर दी। जीविका को पता चला तो उसने कहा," तुमने मेरी फीस क्यों दी ?" उसने कहा," मेरे पास पैसे थे तो मैंने दे दी। जब तुम्हारे पास हो तो मुझे वापिस कर देना।" जीविका ने कहा," मैं अपने मां-बाप की मदद करना चाहती हूं। अब मैं अपने खर्च खुद ही उठाना चाहती हूं।"
करण ने उसे समझाया पर वह नहीं मानी। तब करण ने कहा,"मैं तुम्हारी जॉब का इंतजाम करता हूं। तुम मेरे पापा के ऑफिस में जॉब कर लेना। मैं अपने पिताजी से बात कर लूंगा।"करण के बात करने से जीविका को जॉब मिल गई और वह कॉलेज के बाद पार्ट टाइम जॉब करने लगी। जीविका ने जॉब और पढ़ाई दोनों में अच्छा तालमेल बना लिया था। कॉलेज के आखिरी सैमेस्टर खत्म होने तक उसका जॉब के लिए चयन हो गया और वह दूसरे शहर में जॉब के लिए चली गई। जॉब के साथ कंपनी की तरफ से एक फ्लैट भी मिला। जीविका अपने साथ मां बाप को भी शहर अपने फ्लैट में ले गई और सब अच्छे से जीवन जीने लगे। दूसरे शहर में जाने के कारण करण से मिलना जुलना कम हो गया। पहले तो वह करण के साथ उसके परिवार से भी कभी कभार मिलने चली जाती थी। उसके परिवार से भी उसका गहरा रिश्ता बन गया था। एक दिन करण जीविका की शहर उससे मिलने आ पहुंचा और कहने लगा मैं तुमसे शादी करना चाहता हूं। मां पिताजी भी तैयार है। जीविका के माता पिताजी को भी करण पसंद था इसलिए दोनों परिवारों की मंजूरी से जीविका और कर्ण का विवाह बड़ी सादगी से संपन्न हो गया। शादी के बाद जीविका के ना चाहते हुए भी उसे अपनी जॉब छोड़नी पड़ी। वह तो जॉब नहीं छोड़ना चाहती थी परंतु करण के परिवार वालों के दबाव में आकर उसे यह कदम उठाना पड़ा जिस कारण कभी कभी उसका ह्रदय अत्यंत दुखी हो जाता और वह अपनी इस पीड़ा को अपने पिताजी के सामने व्यक्त करती। उसके पिताजी सदैव अपनी पुत्री के बारे में ये सोचते रहते। वे अपनी पुत्री जीविका को ही पुत्र समान मानते और वह सोचते कि क्या यही उसकी पुत्री के सपनों की उड़ान का अंत है ?
क्रमशः अगले भाग में।

प्रिया धामा