' राजन ! तुम आ गए । मुझे तो लगा था कि तुम इस बार नहीं आओगे । भगवान का लाख-लाख शुक्र है कि उन्होंने हर साल की तरह इस साल भी तुम्हें रक्षाबंधन पर भेज दिया । एक यही त्योहार तो है जो हम बहन - भाई एक साथ मिलकर मनाते हैं । मैं अपने भाई की कलाई में राखी बांधती हूॅं और भगवान से तुम्हारी लंबी उम्र की कामना करते हुए यह माॅंगती हूॅं कि मेरा छोटा भाई हमेशा खुश रहे और स्वस्थ रहे ।' रितिका ने अपने भाई राजन को देखकर कहा ।
हाॅं दीदी ! आपने बिल्कुल सही कहा । मैं भी तो अपनी दीदी को बदले में राखी बांधता हूॅं और यह वादा करता हूॅं कि कोई भी विपत्ति आ जाए मैं अपनी दीदी की रक्षा हमेशा करता रहूॅंगा साथ में मैं भी भगवान से अपनी दीदी की लम्बी उम्र और अच्छे स्वास्थ्य की मनोकामना करता हूॅं । मैं आपका सगा भाई तो नही लेकिन आप मुझे अपने सगे भाई से ज्यादा प्यार और सम्मान देती है । आपने ही तों मुझे पढ़ा-लिखा कर फौजी बनाया है । मैं देश के किसी भी छोर पर रहूं , आज के दिन मैं आपके पास आता रहा हूॅं और आगे भी आता रहूॅंगा ।' राजन ने रितिका के पैर छूकर प्रणाम करने के बाद वहीं पर रखी कुर्सी पर बैठते हुए कहा ।
' राखी का शुभ मुहूर्त निकल जाएगा । जल्दी से नहा - धोकर तैयार हो जाओ तब तक मैं राखी की थाली सजा लेती हूॅं ।' रितिका ने राजन की तरफ देखते हुए कहा ।
' ठीक है दीदी ! मैं दो मिनट में तैयार होकर आता हूॅं ।' राजन ने कहा ।
रितिका ने राखी की थाली सजाई और ड्राइंग रूम में बैठ कर राजन का इंतजार करने लगी ।
' दो मिनट का बोलकर गया था तैयार होने आधे घंटे हों गए , अभी तक नहीं आया ?' रितिका बड़बड़ाने लगी ।
रितिका ने अपना पूरा घर देख लिया लेकिन राजन उसे कहीं नहीं दिखा । वह जोर से राजन .... राजन कहकर अपने भाई को बुलाने लगी ।
' क्या हुआ रितिका ? इतनी जोर से राजन को क्यों बुला रही हों ?' रितिका के पति ने उसे झकझोरते हुए कहा ।
रितिका ने अपने चारों तरफ देखा । वह बिस्तर पर थी ।
' मैं सपने देख रही थी ।' रितिका ने बड़बड़ाते हुए कहा ।
' जी हाॅं मैडम ! आप सपना ही देख रही थी ।' रितिका के पति ने कहा ।
आज राखी है तो राजन जरूर आएगा ... कहते हुए रितिका राजन का इंतजार करने लगी ।
रितिका ने आज सुबह जों स्वप्न देखा उसके बाद से उसका मन विचलित है । उसने राजन को फोन भी किया लेकिन उसका फोन स्विच ऑफ हैं ।
' कहीं वह मुझे सरप्राइज तों नहीं देना चाहता ... लेकिन आज से पहले उसने ऐसा कभी नहीं किया ... । मेरा मन इतना बेचैन क्यों है ? एक बार फिर से राजन को फोन करती हूॅं ... कहते हुए रितिका ने राजन को फोन किया ।
' घंटी जा रही है अब तो राजन जरूर फोन उठा कर कहेगा कि मैं जल्दी ही पहुॅंच रहा हूॅं ... रितिका सोच ही रही थी कि राजन ने फोन उठा लिया ।
' राजन कहाॅं है तू ? इतनी देर से फोन को भी स्विच ऑफ कर रखा था । मेरा मन घबरा रहा है । जल्दी आ ! फिर तेरी खबर लेती हूॅं ।' एक सांस में ही रितिका ने अपने मन की बात बोल दी ।
' दीदी ! मैं राजन नहीं , उसका दोस्त बोल रहा हूॅं । राजन तो आर्मी हाॅस्पिटल के आई. सी. यू में है । कल रात राजन तो आपके पास जाने के लिए निकल ही रहा था कि आतंकवादियो ने हमारे कैंप पर हमला बोल दिया जिसमें राजन बुरी तरह घायल हो गया । आप जल्दी आ जाइए दीदी ।' राजन के दोस्त प्रदीप ने फोन पर कहा ।
रितिका के हाथ से फोन गिर गया चूंकि फोन स्पीकर पर था तों रितिका के पति ने प्रदीप की बातें सुन ली थी । उन्होंने रितिका को संभाला और राजन के पास जाने की तैयारी करने लगे ।
जब रितिका और उनके पति आर्मी हाॅस्पिटल पहुॅंचे , शाम हो चुकी थी । राजन अभी भी आई. सी. यू में ही था । रितिका डाॅक्टर के आगे गिड़गिड़ाने लगी ताकि वह उसे राजन से मिला दे ।
रितिका की हालत देखकर डाॅक्टर ने उसे और उसके पति को आई. सी. यू में जाने दिया । अगले ही पल रितिका आई. सी. यू में राजन के पास खड़ी थी ।
रितिका ने राजन का हाथ पकड़ लिया और रोने लगी । अपने भाई की हालत देखकर उसकी ऑंखो से अश्रु धारा की बरसात होने लगी । एकाएक रितिका ने देखा कि राजन ने अपनी ऑंखें खोली और नही में सिर हिलाते हुए रितिका को रोने से मना कर दिया ।
रितिका ने अपने ऑंसू पोंछ लिए । राजन ने अपने दाहिने हाथ को रितिका की तरफ बढ़ाया और इशारा किया । अपने भाई के इशारे को समझ रितिका ने अपने साथ लाएं हुए रक्षासूत्र को राजन की कलाई में पहना दिया । रक्षासूत्र बांधते ही राजन और रितिका की ऑंखें से एकसाथ ऑंसू निकलने लगें ।
राजन अब खतरे से बाहर था । आर्मी हाॅस्पिटल के डाॅक्टरों का कहना था कि रक्षासूत्र बांधते ही चमत्कार हों गया क्योंकि राजन की हालत देखकर डाॅक्टरों ने भी जवाब दें दिया था ।
धन्यवाद 🙏🏻🙏🏻
" गुॅंजन कमल " 💗💞💓

0 टिप्पणियाँ