तीन रंग से बना तिरंगा नभ में फहर फहर फहराय।
त्याग, शांति , सम्रद्धि की गाथा जग को रहा सुनाय।।
केसरिया में रंगे भगतसिंह, आजाद, गुरू।
खेल रहे थे मौत से बाजी हो गई फिर तो क्रांति शुरू।।
हिंसा और अहिंसा मिलकर स्वतंत्रता यज्ञ में दे रहे आहुति।
अपनी अपनी सभी की सीमा नहीं किसी को कोई शांति।।
जल रही ज्वाला यज्ञ चल रहा सबका था उद्देश्य यही।
मां भारती की कटे बेड़ियां मुस्काए स्वतंत्रता तभी।।
आन बान और शान की खातिर बच्चा बच्चा बना जवान।
सब ने दी आहुति और उपाय स्वतंत्रता की निर्मल शांति।।
बनी रहे यूं ही अटल करना है अब नई क्रांति।।
बने क्रांतिकारी अब फिर से विद्वषों को दूर करें।
भेदभाव की काट के बेडी स्वतंत्रता मजबूत करें।।
स्वरचित मौलिक अप्रकाशित सर्वाधिकार सुरक्षित डॉ आशा श्रीवास्तव जबलपुर

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