मर मर के जी रहे हैं लोग मुर्दों के शहर में
घूंट दर घूंट पी रहे हैं जहर, मुर्दों के शहर में ।
देखकर बनते अनजान ,नजरे यूं ही चुरा लेते ,
टूटता रहता है कहर मुर्दों के शहर में ।
क्या पक्ष या विपक्ष सब जीते खुद के लिए ,
पब्लिक पर भारी भ्रष्टाचार मुर्दों के शहर में ।
महफूज नहीं बहू बेटी घर में भी बाहर भी
मासूमों के साथ होते बलात्कार मुर्दों के शहर में
आए कोई मसीहा यहां खुद ही सूली पर टंगने को,
बेच देंगे देश को गद्दार मुर्दों के शहर में।
सोई हुई खुदी को तुम जगाओ जरा ,सीमा,
इंसानियत हो रही है खुद शर्मसार मुर्दों के शहर में
स्वरचित सीमा कौशल
यमुनानगर हरियाणा

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