महाभारत युद्ध के पूर्व जब कुंती कर्ण से मिलने जाती है, और कर्ण को पुत्र कहकर पुकारती है तो कर्ण की क्या मनोदशा होती है, मैं एक गीत के माध्यम से प्रस्तुत कर रही हूं ।

कहो! किस कारणवश जननी ,तूने आज पुत्र कहकर पुकारा ......
सूत पुत्र राधेय को , कौन्तैय कहकर क्यों दुलारा ......

हे ! जननी यह  ममता मेरे जन्म पर उमडी होती........
तो स्वयं के पुत्र को आज शत्रु दल में तू ऐसे नहीं खोती.....
क्यों मिटाकर अस्तित्व मेरा तूने राजवंश की मर्यादा स्वीकारा ।
कहो ! किस कारण.........

किस प्रकार भूलकर ऋण मित्रता का मैं कौन्तैय बन जाऊं ......
कहो जननी! किस प्रकार मैं तुम्हें छ: पुत्रों की माता बनाऊं.....
यह मित्र मेरा उस क्षण का है , जब सूत पुत्र कह कह के राजवंश ने दुत्कारा ।
कहो किस कारण .........

एक वचन देता हूं जननी पुत्र होने का कर्तव्य निभाउंगा .......
पांच पुत्र पले तेरे आंचल में ,पांच तुम्हें लौटाऊंगा.......
ऋण नहीं रखता किसी का, हर ऋण जीवन में उतारा ।
कहो किस कारण........

हे जननी मानकर कलंक जिसे, तूने गंगा में विसर्जित कर दिया था.......
राधे मां ने उस अबोध को ममता का आंचल दिया था.........
हे ! भरत वंश की कुल वधू राधेय लेता है चरण रज तुम्हारा ।

कहो ! किस कारणवश जननी, तूने आज पुत्र कह कर पुकारा !
सूत पुत्र राधेय को , कौन्तैय कह कर क्यों दुलारा ।


.......✍️ पिंकी मिश्रा
भागलपुर बिहार ।