हवा की सरसराहट कानों में रस घोलती है,
मानो प्रकृति हौले से हमसे कुछ कहती है।
जैसे कह रही हो, कर विश्वास मेरा..
अमृत कलश से भरी,वात्सल्य से भीगी
ममता का आँचल पसारती माता हूँ मैं।
स्निग्ध रश्मियाँ हाथ बढ़ा रक्षा सूत्र पहनाए,
ऐसी निर्मल सहोदरा हूँ मैं।
सुगढ़ सलोनी रुनझुन सी वल्लरी
लुकछिप अंको में भरती,प्रनयनी प्रेयसी हूँ मैं।
या........
कहे दिवाकर चमको, दमको,
करो तमस का तुम नाश।
मृगांक कहे गुमसुम होकर,
क्षय-अक्षय सहना तुम
पर करना अमावस को भी पूनम समान।
कहे धरा मुखड़े को चूम कर,
धीरज धरना अनगित भी हो जो भार,
नभ कहता विस्तार लो इतना, ढंक लो सारा संसार।
धरणीधर कहे शीश उठा कर शिखर बनो
पर पाँव टिके धरातल पर ही
जलधि कहे गहराई को छूना,
करना राज सीप मोती पर।
बोलें नदियाँ कल-कल, कानों में,झरने देते झकझोर
रुकना नहीं,थमना नहीं, बढ़ना है गन्तव्य की ओर।
कहे वृक्ष झूम-झूम कर, डाले गलबहियाँ मदमस्त
फलो, फूलों,खूब बढ़ो तुम,पर देना शीतल सी ओट
पथिक जो बैठे थककर,विनय ही हो आधार।
भौरों की गुनगुन कानों में राग सुनाती है,
जैसे वाचाल प्रकृति हमें विश्वास दिलाती है।
गुपचुप हमसे सबकुछ कहती है,
वो हमसे सबकुछ कहती है.....
मधुलिका सिन्हा
कोलकाता
मौलिक और सर्वाधिकार सुरक्षित

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