एक जगह चार महिलाएं थीं,लेकिन चारों चुप थी।
ये वाक्य उतना ही गलत है,जितना की सूर्य पश्चिम से निकला हो।
राधा के घर सत्यनारायण भगवान की पूजा थी।
राधा ने अपनी सहेलियों को बुलाया था।
पूजा के एक दिन पहले_
रानी ने रिचा को फोन किया _सुन तू साड़ी पहनेगी या सूट?
रिचा_यार गर्मी बहुत है ,मैने तो सूट ही पहन लेना है , मैं साड़ी ढंग से संभाल भी नहीं पाती।
और तू भी तो  बता कि तू क्या पहन रही ?

मैं नीतू, मिस्टी,और नूतन से बात करके डिसाइड करूंगी_रानी ने कहा।
ओके मुझे भी बता देना, रिचा ने फिर फोन काट लिया।
अब उसने आलमारी खोला ,चेक करने लगी , साड़ी पहनूं या सूट ।
पूजा का मामला है ,सब साड़ी ही पहनेंगी।
देखती हूं पीले रंग की साड़ी,या लाल देखूं।
पूरा वार्डरोब साड़ियों से गंजा पड़ा था।
लेकिन रिचा को एक भी साड़ी समझ में नहीं आ रही थी।एक एक कर निकालती ,और मुंह बनाकर एक किनारे रखती जाती।
सभी साड़ियां एक बार कहीं न कहीं पहनी गई थीं।
वो सर पकड़ कर बैठ गई।
तब तक रानी का फोन आया ,सुन रिचा सभी लोग साड़ी  पहन रही हैं।
पर मेरे पास तो कोई नई साड़ी नहीं है_दुखी स्वर में रिचा ने कहा।
ये क्या कह रही है,अभी तो तूने मेरे साथ शोरूम से 4 साड़ियां ली थी।और एक उसमें पीले रंग की भी थी।
हां याद आया ,पर वो तो मैने टेलर को दी हुई है।
चल फोन रख मैं अभी वहां से लाती हूं_रिचा खुश होती हुई बोली।
अगले दिन सभी साड़ियों के साथ मैचिंग करती बिंदी ,चूड़ी,हार,कान के बूंदे पहने पूजा में पहुंचीं।
सभी सहेलियों ने एक दूसरे के पास ही आसन जमाया।
पूजा शुरू हो गई ,पांच मिनट हुआ नहीं था ,सबकी फुसफुसाहट शुरू हो गई ,मिस्टी ने नूतन से पूछा _तूने ये कान के बूंदे कहां से खरीदे।नूतन ने इतराते हुए कहा _हुनर हाट से,और तेरी ये साड़ी बड़ी सुंदर है ,तूने कब लिया।
मिस्टी ने कहा _ये मम्मी ने कोलकता से भिजवाया था पिछले सप्ताह , बालूचरी।
ओह,सबने प्रसंशा में मुंह बनाया।
पंडित जी की कथा चालू थी ,कलावती ,और लीलावती।
इधर भी कथा चालू थी ,फैशन की घर की ।कई कथाएं इसी में शुरू हुई और सत्यनारायण कथा के समाप्त होते ही खत्म हो गईं।
चलो चलो आरती ले लो,राधा ने कहा।
सभी सहेलियों ने आरती ले ली,और बाद में प्रसाद लेकर  अपने कथा पुराण का वहीं समापन कर अपने अपने घरों की ओर प्रस्थान किया ,अगले आमंत्रण के इंतजार में.....।