यह कौन है ;
अनहद से उद्वेलित... 
हमारी अनियंत्रित ह्रदय के ताल 
को लयबद्ध करता नाद... 
यह कौन सी ध्वनि है ;
हमारे चित्कार को सुरबद्ध 
करता, फिर किसी लड़ी में पिरोता 
मधुर तान का भाव लिए नाद.... 
इस जड़ -चेतन का मिलन बिंदु 
स्वतःप्रकम्पित सृस्टि के कण -कण में व्याप्त, 
अस्तित्व को आयाम देता नाद... 
सबको ध्रुवीकृत करता,
अपनी केंद्र से पृथक रखता,
धरा, सूर्य, गगन, चंद्र और तारों को 
व्यवस्थित रखता नाद... 
मैं के बोध को अस्तित्व देता ;
इच्छा को प्रतिध्वनित करता नाद... 
यह ध्वनि व्यापत.. ब्रह्माण्ड में... 
उद्बोधन में, प्रकम्पन में, प्रस्फुटन में,, 
जड़ और चेतन में,,, 
एक सा पिरोया हुआ नाद... 
उस ब्रह्मनाद से उत्पन्न हुआ नाद.. 
ब्रह्माण्ड को  लयबद्ध रखता नाद.... 
एक लय, एक ताल, एक तान के लिए 
कण -कण को तैयार करता नाद... 
सृष्टि को व्यवस्थित रखता ध्वनि है नाद। 
                     ©  डॉ पल्लवी कुमारी "पाम "
                          अनिसाबाद, पटना,बिहार