कक्षा कक्षा तीन का क्लास बंक जो ..मानसपटल पर सदैव अंकित रहेगा .।." अब आगे ..." ( सातवीं कक्षा में क्लास बंक)
पापा मेरा बनारसी लहंगा आ गया है .. " अंकल जी खबर किये थे जल्दी लाना होगा नहीं तो बिक जाएगा ..।" मैंने पापा से सिफारिश की ।
पापा- - " तो, कल हीं चले जाओ मम्मी के साथ। बाबू का कपड़ा भी खरीद लेना । "
जी पापा .." हमने चहकते हुए कहा!
सिर्फ लहंगा पहनेगी तू ? कैजुअल कपड़े हैं. ..? भैया ने पूछा। "
है! पर तीन सेट और चाहिए। तिलक, जनेव, बारात..। हमने अवसर गिन कर बता दिये..." ।
तो मेरे साथ चलना फिर ..कल मम्मी तेरा लहंगा ला ही देंगी।
अभी पैसे कम हैं.." एक सेट हो पायेगा... " भैया ने परामर्श दिया।
मुझे अपनी पसंद का चाहिए।"
मैंने मिमियाते हुए कहा। " मैं मम्मी के साथ हीं खरीदूंगी।
पिछले बार गइ थी तूझे बुखार हो गया था ..है न पापा ...?
मैं घर पे दुकान बुला दूंगा .. पसंद कर लेना। "
हाँ बेटा! लेटेस्ट कपड़े आ जाऐंगे घर पे ..ठीक तो कह रहा है भैया तुम्हारा ..। " पापा ने समर्थन किया ।"
मैं मुंह बनाये मां के पास गई ..और साथ चलने की जिद करने लगी।
मेरी बात सुनकर मेरा अनुज भी हाथ पैर पटकने लगा। अन्ततः उसका प्रस्ताव पारित हुआ और मेरा ख़ारिज कर दिया गया।
वो मुझे चिढा कर अपना नया कपड़ा निकालता और मुझसे कहता--आपको तो जाना नहीं है ..मैं कौन सा पहन के जाऊंगा कल ..?
और मेरा पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया..। "
पर विवश थी, बड़े भैया जो डिसीजन लेंगे सब उनसे सहमत हो जाते हैं। मेरी तो कोई सुनता हीं नहीं।
बुझे मन से मैं सोई,
और भाइ खुशी के मारे उछल रहा था।
सुबह भैया दौडने जाते, उससे पहले मुझे जगाने के लिए मेरी आंखे धो कर जाते ..और ज्यों ही वो जाते मैं फिर आ कर सो जाती।
अगली सुबह भी ऐसा ही हुआ। भैया ने मेरा मुंह धोया..बाहर निकले और बोलते हुए गये ..तू टाईम पर स्कूल चली जाना ..।मम्मी का सहयोग करो उठ कर.. नहीं तो .उनकी बस छूट जाएगी।
मै पुनः सोने वाली थी...
तभी हमने पापा को देखा ,वो अपना पासबूक देते हुए मम्मी से बोले ..पैसे कम पडेंगे, तो निकाल लेना। मां ने बैंक पासबुक अपने पर्स में रखा और तभी मेरे दिमाग के घोड़े दौडने लगे।"
जब पैसे मिल रहे हैं तो कपड़े में क्या विलंब? मैं तो जाउंगी मां के साथ। फिर मैंने नियत समय पर अपना कार्य कर प्रतिदिन की भांति स्कूल के लिए तैयार हो गइ।
फिर एक दुस्साहस किया.." मां के पर्स से पासबूक निकाल अपने बैग में रखा ..और मां से पहले निकल गई, फिर पुवाल के बोझे के बीच में छूप कर बैठ गई। अब मुझे मां के निकलने के दस मिनट बाद उनके पीछे जाना था।
मां को जाते हमने देखा..फिर दस मिनट के लिए पुवाल में छुपी रही ..और ज्यों ही निकलने का उपक्रम किया.. मेरे रक्त सुखने लगे .. भैया कंधे पर चारपाई टांगे हाथ में पुस्तक लिए बगीचे के लिए निकल पड़े थे। वो मंद गति से मेरी हीं तरफ बढ़ रहे थे। क्षणमात्र में मैने खुद को सर से पैर तक पुवाल से ढंक लिया। और भैया के निकलने की प्रतीक्षा करने लगी।
ज्यों -ज्यो भैया के क़दम मेरी तरफ़ बढ रहे थे मेरी हृदय गति बढ़तीजा रही थी । आत्मरक्षा हेतु मैंने सारे मंत्र पढ़े जो मुझे याद थे ..।
दिन दयालु विरिदु संभारी ...."
.हरहु नाथ.मम संकट भारी ..।" मां ने संकट काल में पढने को बताया था ।
त्राहि माम! अक्सर दादाजी बोलते वो भी मैंने पढ़ा। "
हे प्रभु!रक्षा करना। भैया के नज़र से बचाना। मुझे क्लास तीन वाला थप्पड़ याद आने लगा।
आखिर प्रभु ने मेरी सुन ली और भैया वह रास्ता पार कर गये।
मै वहाँ से निकल कर भागी, अब मेन रोड छोड़ कर शार्टकट रास्ता पकड़ा और दौड़ने लगी।
तबतक मां हमें दिख गइ और मैंने पासबूक हाथ में लिया और मां को आवाज़ देने लगी।
मां मेरी आवाज़ सुन कर रूकी। मै पास गई और बोली.."
मां ये गिर गया था। अब वहां से घर आने का कोई प्रश्न ही नहीं था.. स्कूल पीछे छूट गया था।
मै, मां और भाइ के साथ मार्केट पहुंची और सबसे पहले अपना बनारसी लहंगा खरीदा, दो सेट कपड़ा भी लिया, फिर हमदोनों भाई बहन ने अपने पसंद की पूरी खरीदारी कर ली ।
घर आ कर मां ने क्या तारीफ की- " वो तो बबुनी पासबूक ले कर दौडी है नहीं तो कहां से कपड़े आये होते ? मुझे मन -हीं'- मन हंसी आ रही थी।
मैंने रात भर में कई बार उठ कर अपना लहंगा देखा फिर दिन गिनने लगी ..अब एक हप्ते में पहनना है इसे ..। "
पर एक हप्ते बाद सब लोग मेरी प्लानिंग जाना गये। जब भैया पुवाल निकालने गये और उसमें मेरा पायल मिल गया।
तू गइ कब थी वहां? और काम क्या था पुवाल का ..?
अब मुझे पिटने का डर नहीं था और मैंने पूरी बात सच- सच बताई .. सबको हंसते हुए पेट में बल पड़ गए। " भैया बोल पड़े- हमने भी यही सोचा कि ये मां से पहले निकली और पासबूक कैसे पा गइ ...? अनुज बोल पड़ा .."
" भैया दैविय शक्ति मिली है इनको ..एक बार फिर हमसब हंस पड़े।
✍उर्मिला तिवारी

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