जीवन पथ पर, परचम लहराती हैं बेटियाँ,
फिर क्यों...? समाज समझ नहीं पाता,
परचम लहराती हैं बेटियाँ....
माँ की प्यारी, पापा की दुलारी होती हैं बेटियांँ,
फिर क्यों...? पराई कही जातीं बेटियाँ,
परचम लहराती हैं बेटियाँ....
माँ की ज्योति, पापा का मान अभिमान हैं बेटियांँ,
फिर क्यों...? बेटे से कमतर हैं बेटियाँ,
परचम लहराती हैं बेटियाँ....
भाई बहिन का प्यार, राखी का मान हैं बेटियाँ,
फिर क्यों...? नहीं भातीं हैं बेटियांँ,
परचम लहराती हैं बेटियाँ....
मान मनौअल, और भाई की हमराज हैं बेटियाँ,
फिर क्यों...? आँखों की किरकिरी हैं बेटियाँ,
परचम लहराती हैं बेटियाँ....
हमारे भारत देश की, विख्यात हैं अनेकों बेटियाँ,
फिर क्यों...? आँखों में खटकती हैं बेटियाँ,
परचम लहराती हैं बेटियाँ....
इंद्रा गांधी, रानी लक्ष्मीबाई, कल्पना जैसी बेटियाँ,
फिर क्यों...? सम्मान नहीं पातीं बेटियाँ,
परचम लहराती हैं बेटियाँ....
देश की खातिर, जान न्यौछावर करतीं बेटियाँ,
फिर क्यों...? नाम न पातीं बेटियाँ,
परचम लहराती हैं बेटियाँ....
नवदुर्गा में पूजने, ढूंढते फिरते कन्याओं को,
फिर क्यों...? रौंदी जातीं हमारी बेटियाँ,
परचम लहराती हैं बेटियाँ....
हम पूजा करते, लक्ष्मी, गौरी, सरस्वती की,
फिर क्यों...? हरदम पूजते नहीं बेटियाँ,
परचम लहराती हैं बेटियाँ....
देश का नाम, रौशन कर रहीं हैं आज बेटियाँ,
फिर क्यों...? नहीं बदलते मानसिकता,
परचम लहराती हैं बेटियाँ....
आज बेटियों से हैं, नर- नारी इस जहाँ में,
फिर क्यों...? भूला तू मानव, माँ ही हैं बेटियाँ,
परचम लहराती हैं बेटियाँ....।
काव्य रचना-रजनी कटारे
जबलपुर ( म.प्र.)

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