सूरज निहारता जग को
सुबह से शाम तक
चाहत होगी मन में
कोई निहारे उसे भी
उसी की ही भांति
देखें दो प्रेमी एक दूजे को
बात करें दे आंखों में आंख
सुबह से शाम तक
देव, दनुज, मानव
कौन शक्य था
प्रेम सूरज से करना
आसान तो नहीं
बड़ों में नहीं बड़ी बात
छोटे कर जाते बड़ा काम
सूरज के प्रेम दीवानी
सूरजमुखी निहारती सुबह से शाम
यही प्रेम है
समर्पण पूर्ण
बहुत छोटा सा पुष्प
अब छोटा नहीं रहा
भगवान दिनकर का प्रेमी छोटा नहीं
सूरजमुखी प्रतीक उच्चता का
प्रेम और समर्पण का
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

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