रचित और शैव्या दोनों एक खुशहाल शादी शुदा दंपत्ति थे,4 साल की शादी के बाद भी वे अभी संतान सुख से वंचित थे।
रचित गुड़गांव के एक मल्टी नेशनल कंपनी में नौकरी करता था।उसके माता पिता ,भाई दिल्ली में रहते थे। शैव्या का मायका भी दिल्ली में था।
वैसे रोजाना दिल्ली से आना जाना संभव था ,लेकिन कष्टप्रद भी,इसलिए रचित शैव्या के साथ गुड़गांव (गुरुग्राम )रहने आ गया।
शैव्या और रचित की मुलाकात डॉक्टर अरोड़ा के नर्सिंग होम में हुई थी ,डॉक्टर अरोड़ा शहर के जाने माने डॉक्टर थे।उनके नर्सिंग होम में बड़े बड़े डॉक्टर अपनी सेवा देते थे ,खुद डॉक्टर अरोड़ा ऑर्थोपेडिक सर्जन थे ,और उनकी पत्नी माला स्त्री रोग विशेषज्ञ ।
शैव्या उसी नर्सिंग होम में नर्स का काम करती थी।
उसके पिता एक फैक्टरी में छोटी नौकरी करते थे ,घर में उसके अलावा दो छोटे भाई बहन थे। मां बचपन में ही गुजर गई थी।
घर का खर्च और भाई ,बहन की पढ़ाई उसके और पिता के पैसे से ही चलता था।
शैव्या आकर्षक काया ,और व्यक्तित्व की स्वामिनी थी लेकिन जिम्मेदारी के बोझ के कारण वह गंभीर और मुरझा गई थी ।
उसके चेहरे का ओज कहीं छिप सा गया था,और उसकी बहन जी वाली छवि ही उसके सहकर्मियों में हावी थी।
जिस तरह बादलों से ढंका सूर्य बादल के हटते ही प्रकाशित हो जाता है।वैसे ही रचित का साथ मिलते ही शैव्या निखरने लगी।
रचित का एक्सीडेंट हुआ था ,रचित के पैर में फ्रैक्चर था शैव्या ने उसका बहुत ख्याल रखा था।
हॉस्पिटल से डिस्चार्ज होते होते दोनों के बीच एक अनोखा रिश्ता बन गया था।
डिस्चार्ज होने के बाद डॉक्टर अरोड़ा ने उसे फिजियोथेरेपी की सलाह दी _
मिस्टर रचित ,आप सप्ताह में 3 दिन आकर राकेश से फिजियोथेरेपी करा लिया कीजिएगा।
बहुत जल्दी आप फिट और फाइन हो जाएंगे। ऑल द बेस्ट।
डिस्चार्ज होने के बाद रचित फिजियोथेरेपी के लिए भी वह उसी नर्सिंग होम में डॉक्टर राकेश के पास जाने लगा। वहां अक्सर उनकी मुलाकातें होती रहती।
धीरे धीरे रचित को यह महसूस होने लगा कि अब शैव्या के बिना उसकी जिंदगी अधूरी है ,और एक दिन उसने शैव्या के सामने अपना हाले दिल बयां किया और शादी का प्रस्ताव रखा।
शैव्या के मन की मानो मुराद ही मिल गई ,हैंडसम,पैसे वाला जीवनसाथी तो हर लड़की के जीवन का सपना होता है ,उसके सपने को मानो पंख लग गए।
उसने तुरंत हामी भर दी।
शैव्या के पिता को इस रिश्ते से कोई ऐतराज नहीं था ,वो बहुत खुश थे शैव्या के भविष्य को लेकर ,रचित जैसा दामाद वो दो जन्म लेते तब भी नहीं पाते।
लेकिन रचित के माता पिता और भाई को इससे ऐतराज था ,उन्हें पता नहीं क्यों पहली नजर में शैव्या अच्छी नहीं लगी थी।
वो चाहते थे कि रचित इस रिश्ते को समय दे,कुछ समय एक दूसरे को समझ ले उसके बाद ही शादी करे ।
उनका अनुभव कहता था कि ,कभी कभी रिश्ते क्षणिक आकर्षण से भी बन जाते हैं।
फिर भी रचित की जिद और शैव्या के पिता से मिलने के बाद उन्होंने अपनी मंजूरी दे दी।
लेकिन उनकी एक शर्त थी कि , शैव्या नौकरी नहीं करेगी।
शैव्या ने यह बात मान ली।
उसने अपनी नौकरी से इस्तीफा दे दिया।
धूमधाम से दोनों की शादी हो गई।
दोनों ही बहुत खुश थे,रचित के माता पिता का भी शैव्या ने दिल जीत लिया ।
उनकी बेटी नहीं थी , शैव्या के रूप में उन्हें बेटी मिल गई थी।
दोनों मॉरीशस हनीमून के लिए, रवाना हुए।
वहां का समुद्र तट,जंगल,ऐतिहासिक इमारतें,नाइट लाइफ में पुरुषों का वाद्य यंत्र बजाना और महिलाओं का नृत्य पर्यटकों की यात्रा में रोमांच पैदा करता है।
चामरेल में सात रंग के बालू जिसे देखकर बरबस लोग उंगली दबा लेते हैं।
शायद यह किसी ज्वालामुखीय विस्फोट का परिणाम था।
दोनों बेफिक्र बाहों में बाहें डाले एक दूसरे में खोए मस्त घूमा करते ।
शैव्या को यह सब सपना लग रहा था ,वह खुद को एक रानी की तरह महसूस कर रही थी।देशी ,विदेशी ,व्यंजन ,बियर सब उसके लिए नया अनुभव था।
आखिर महीने भर बाद उनका मधुमास खत्म हो गया।
वे वापस भारत आ गए।
क्रमशः

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