रचना - गिरने की आवाज़ सुनकर रविश की आंखें खुल गईं । बैड को देखा तो शिवांश मजे से सो रहा था लेकिन स्वाति नहीं दिखी । जब रविश सोफे से उठ कर पलंग के नीचे नीचे देखा तो उन्हें स्वाति पलंग से नीचे गिरी हुई दिखाई दी । स्वाति अपना पैर पकड़ कर बैठी हुई थी । 
रविश - स्वाति आप यहां पलंग के नीचे क्या कर रही हैं । स्वाति मन में - आज शादी के पहले दिन ही इज्जत का कचरा हो गया । अब ये क्या सोचेंगे मेरे बारे में कि , एक बच्चे की मां होकर पलंग से गिर गई । हे भगवान अब क्या कहूं इनसे ! 
रविश - स्वाति , मैं कुछ पूछ रहा हूं आपसे ।आप ऐसे नीचे क्यूं बैठी है ? स्वाति - वो मैं ... मैं... नींद में पलंग से नीचे गिर गई । स्वाति ने सर झुकाए हुए कहा और उठने की कोशिश करने लगी । लेकिन पैर में मोच आने के कारण उठ नहीं पा रही थी । रविश , स्वाति को सहारा देकर पलंग पर बिठाते हुए - स्वाति , आप पलंग पर से कैसे गिर गई । स्वाति मासूमियत से - आप हंसेंगे तो नहीं ! रविश मुस्कुराते हुए - नहीं हसूंगा अब बताओ । स्वाति - वो ...जब मैं छोटी थी तभी से सपने देखते हुए मैं पलंग से गिर जाती हूं । रविश हंसते हुए - अब समझा , इसलिए आप मुझे पलंग पर सोने के लिए कह रही थी क्यूं ! 
स्वाति संकोच के साथ - जी । 
रविश , स्वाति की तरफ देखते हुए - अपना पैर दिखाईए । स्वाति - मेरा पैर ठीक है , वो गिरने की वजह से थोड़ा दर्द कर रहा है । पर वो भी ठीक हो जायेगा । 
रविश मुस्कुराते हुए - इसलिए   तो कह रहा हूं , दिखाइये‌ मुझे । रविश , स्वाति के पैर को छू कर देखते हुए ।
स्वाति - कुछ नहीं हुआ है रविश जी मैं बिल्कुल ठीक हूं । रविश - डॉ . तुम हो या मैं ! अब मुझे चुपचाप देखने दो । रविश - हल्की सी मोच है । रूको मैं मलहम लगा देता हूं । स्वाति - नहीं रविश जी मैं खुद लगा लूंगी । रविश - चलो अच्छा है । इसी बहाने तुम्हारे मुंह से अपना नाम तो सुना । स्वाति अपनी आंखें नीचे करते हुए - प्लीज़ आप ये गिरने वाली बात किसी को मत बताइएगा ! 

क्रमशः 

रचनाकार - श्वेता सोनी