*आत्मा अविनाशी*एक है,
  मत      करियों      बेचैन।1।
*आत्म ज्ञान* से हरि  मिलें,
खुलें   *हृदय   पट    नैन*।।2।।

स्वागत  सन्त   *कुटीर गृह*,
*अथिति   देवता*    आव।3।
खग-मृग जड़-चेतन जगत,
सब    में     ईस्वर     भाव।।4।।

*मन पंछी* भटकत  फिरत,
*हिय     सागर*       बेचैन।5।
लगन लगी हरि *पद कमल*
दरसन        प्यासे       नैन।।6।।

*जीवन    पानी    बुलबुला*,
है   *माया  मय *    संसार।7।
प्रीत करौ प्रभु *चरण कमल*,
स्वारथ     लगि      परिवार।।8।।

*मनवा पंछी* वन-वन भटके,
ढूंढत       *हरि       आहार*।9।
गोदी      *रोहित    पुत्र*     है,
संग    सोहति    *तारा   नारि*।।10।।

*कुश बिस्तर*  *शैया धरणि*,
*आश्रय     बृक्ष*     विशाल।11।
विचरत   है      *संसार   गृह*,
जन-जन     करत     निहाल।।12।।

स्वरचित एवं मौलिक

शीला द्विवेदी "अक्षरा"
उत्तर प्रदेश "उरई"