तड़़प रही हैं गंगा
हम इंसानों की वजह से आज तड़़प रहीं है गंगा
सबको जीवन देने वाली
सबकी प्यास बुझाने वाली
हवाओं के साथ गुनगुना ने वाली
हर शुभ कार्य कराने वाली
बंजर को उपवन बनाने वाली
.......... आज हम सब के गुनाहों के बीच दब कर
तड़़प रही है गंगा
देवों के द्वारा पुजे जाने वालीं
शिव की महिमा, काशी की गरिमा
कहे जाने वाली
यह सत्य है कि, मुक्ति का द्वार कहे जाने वाली
अमृत बरसाने वाली
हम इंसानों की वजह से जहर हो रही है गंगा
अविरल, कोमल, चंचल, निर्मल सी रहने वाली
सिर्फ नदी नहीं ,धर्म जाति को सजाने वाली,
पापों को धो के पवित्रता का श्रृंगार कराने वाली
हम इंसानों की वजह से अपवित्र हो रही है गंगा
हम इंसानों की वजह से तड़़प रही है गंगा...........

0 टिप्पणियाँ