जब इश्क घुल जाता है
चाहतों की असीम उम्मीदों में
खो बैठता निज ऊंचाई को
लिसने लगता स्वार्थ की गंदगी से
बेबफाई जन्म लेती है
मिलन और जुदाई
दोनों इश्क की अदाएं हैं
मन में बसा हुआ
कब जुदा होता है
बफा और बेबफाई का
मिलन, जुदाई से क्या रिश्ता
जुदा होकर भी मुस्कराती बफाई
मिलन के बाद भी जन्मती बेबफाई
कब मिल सकीं राधा
अपने प्रियतम श्याम सुंदर से
कर्तव्य वेदी पर रच विवाह
षोडस सहस्र रानियों संग
कब भुला पाये श्याम
अपने प्रथम प्रेम को
बफाई है यकीन का नाम दूजा
यकीन रहते बफाई नहीं मरती
नयनों से नीर गिराकर प्रतिपल
याद प्रियतम को करती रहती
आंसू बफाई के नयनों से निकल
हवन वेदी का घी बनते हैं
हवन चलता आखरी श्वास तक
किसी की विजय राह बनते हैं
इश्क में मिलना तो बहुत छोटा है
बड़ा है बफा कर जुदा भी होना
इश्क की शूली पर खुद को मिटा देना
मरकर भी जीने की दुआ दे जाना
जब इश्क का उच्च शिखर
बह जाता बासना की बारिश में
उसी दलदल की तलहटी से
बेबफाई जन्म लेती है
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

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