मैं स्त्री बस नाम की नहीं ,
          इस्त्री करती हूँ सभी रिश्तों पे भी
मैं स्त्री बस नाम की नहीं........।

जब कभी पर जाती है रिश्तों पे सिलवटें,
                 मीठे शब्दों के छींटे मार 
अपनेपन की गर्माहट से करती हूँ इस्त्री
मैं स्त्री बस नाम की नहीं............।

एक-एक रिश्तों को प्यार से मोड़ती हूँ,
      गलत दिशा में न मुड़ जाए इसका भी
ध्यान रखती हूँ फिर विश्वास से संभालते हुए
                 तह लगाती हूँ.......।

मैं स्त्री बस नाम की नहीं,
      इस्त्री करती हूँ सभी रिश्तों पे भी........।
                   *******ऋचा कर्ण✍✍✍