बड़ा शहर मध्यम श्रेणी परिवार से ताल्लुक रखते 
हैं, मि.बी.डी.सिंग साहब...ज्यादातर सभी उन्हें सिंग 
साहब के नाम से ही जानते हैं....सरकारी महकमें से 
अब तो... रिटायर हो चुके हैं...पर अपना समय पास 
करने को एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करने लगे....
पत्नी उनकी बड़ी सुंदर सुशील पढ़ी लिखी... एक 
छोटे से गावँ सहजपुर की...बहुत ही सुलझे हुये विचारों 
की महिला......

कुछ दिन से सिंग साहब की तबियत कुछ नासाज़ है, 
सो दो-चार दिन से अवकाश पर हैं....दोनों पति-पत्नी 
बैठे, पुरानी यादों में खोए बात चीत कर रहें हैं......
देखो जी चार बेटे हैं अपने....पर आज जरुरत के 
वक़्त...एक भी बेटा अपने पास नहीं है...मेरी भी 
तबियत ठीक नहीं है.....कुछ दिन से देख रहा हूँ....
तुम भी बहुत... कमजोर नज़र आ रही हो...बार बार तुम्हारी तबियत भी बिगड़ जाती है.....

एक उम्र के बाद कुछ न कुछ लगा ही है...कितने खुश
थे हम....जब पहला बेटा हुआ... फिर दूसरा भी बेटा
खुशी का ठिकाना न था.... फिर बेटी की चाहत में
तीसरा बेटा हुआ....मेरी माँ तो बहुत ही खुश हुयीं
थीं....साक्षात लक्ष्मी है हमारी बहू तो......
समय यूँ ही निकलता चला जा रहा था....मैं अपनी
नोकरी चाकरी में लगा रहता था....तुम अपने बच्चों 
के लालन-पालन में....बच्चों की परवरिश में हमने 
कोई कमी न रखी....एक बेटी की चाहत थी...पर 
ईश्वर की इच्छा फिर बेटा हो गया..... आखिर फिर आपरेशन करवा लिया....बेटी की चाहत मन में ही 
रह गयी.....बच्चे पढ़ लिखकर अच्छी सर्विस में लग गये...एक एक कर.... सबकी शादी भी कर दी....
सब अपनी अपनी पत्नी के साथ बाहर हैं...कितना 
विचारों में परिवर्तन आया....आज सोचता हूँ अपने बच्चे....वो भी लड़के चार!! पर एक भी अपने पास 
नहीं है....न ही माँ बाप की कोई फिकर है......

काय हम कबहुँ कबहुँ जयी सोचत आयें....हमाये 
लाने मौड़ा मौड़ा ही दये... भगवान जी ने एक मोड़ी 
ने दयी!! काश एक मौड़ी दयी होती!!!
मैं भी वही सोचता हूँ शालू......
काश ईश्वर ने एक बेटी दी होती......।

    कहानीकार- रजनी कटारे
     जबलपुर (म.प्र.)