युद्ध के बाद पताका लिए ,
एक सैनिक ने देखा जब युद्धे जमीं,
खूं की नदियां दिखाई दीं चारों तरफ,
शव इतने वहां मेंजिसकी गिनती नहीं,
ऐसा मंज़र दिखा विजय मिलने के बाद,
देख लाशों का अंबार मन विचलित हुआ,
सैनिक खुद से ही प्रश्न करने लगा,
युद्ध होता है क्यों??
युद्ध करते हैं क्यों??
प्रश्न खुद से किया,
उत्तर पाया यही,
लालसा का जब दानव,
मन पर कब्जा करे,
इच्छा सुरसा की तरह जब बढ़ने लगे,
इंसा के जज़्बात तब खोने लगे,
जब मानव का मन विकृत होने लगे,
सारी अच्छाईयां जब धूमिल होने लगें,
मानव दानव बने अहम उसके बढ़े,
इस जहां की हर वस्तु मेरी रहें,
ऐसे ख्यालात जब सताने लगें,
तब युद्ध की भेरी बजती है जग में,
युद्ध का तांडव तब होता है रण में,
हर सैनिक रण में सोचे यही,
देश का मान मर्दन हम होने न देंगे,
हमारा जो है उसे लेने न देंगे,
मिट जाएंगे हम शीश झुकाने न देंगे,
युद्ध दोनों लड़े विजय पाने की खातिर,
एक विजयी हुआ एक रण में बिछा,
ऐसा करने का फ़ायदा क्या हुआ??
जो तुम्हारा है वह तुम्हारा रहे,
हमारा हमसे छिनतें हो तुम क्यों??
मैं ईश्वर बनूं सब कदमों में हों,
लालसा के इस दानव को,
सुरसा बनने न दो,
वरना सब कुछ सुरसा निगल जाएगी,
इस दुनिया का मानव दानव बनेगा,
यहां सिर्फ़ लाशों का व्यापार होगा।।
डॉ कंचन शुक्ला
स्वरचित मौलिक

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