जब -जब  हुई जब -जब हुई आलोचना , खुलते गए यह लोचना .. . 

लोचन से जब -जब नीर गिरा, तब तिमिर हटा , मिटा कोहरा 
प्रतिपल, प्रतिक्षण, अपने पथ पर चलने को राही निकल पड़ा

हो जन्मभूमि -या -कर्मभूमि , ना कर कोई अवहेलना ।

जब -जब हुई आलोचना ,खुलते गए यह लोचना . . . 

दुर्गम राहे भी हुई सुगम ,संघर्ष बना है शस्त्र यहां ,
संकल्प बना है सहचर अब है, दृढ प्रतिज्ञ सा अस्त्र यहां 

जिज्ञासा का है भाव सबल ,कर पाते नही विवेचना ।

जब- जब हुइ आलोचना खुलते गए ये लोचना . . . 

है क्षितिज बिंदु पर टिकी दृष्टि ,जब साथ हुई संपूर्ण सृष्टि 
जीवंत हुई यह चेतना , . . . 

जब -जब हुई आलोचना ,खुलते गए ये लोचना . . . 

(उर्मिला तिवारी )देवरिया