एक महिला अध्यापिका की दिनचर्या कैसी होती है आइए जानते हैं । पूरा जरूर पढ़िएगा -

एक लेडी टीचर कदम रखती है बाहर।
अपने घर से अपने स्कूल की ओर।
बैग थामे फाइल पकड़े 
साड़ी का छोर संभालती हुई 
जल्दी जल्दी चलती है।
कि कहीं बस छूट ना जाए 
और सुननी ना पड़े दो बातें।
कुछ बसें चली भी  जाती हैं ।
फर्राटे से निकल कर सामने से
और वो हाथ देती हुई खड़ी रह जाती है।
अगर मिल गई समय से बस
तो जान में जान आती है।
सीट मिली तो थोड़ा सुस्ता लेती है।
वरना खड़े होकर सोचती रह जाती है।
अरे आज तो रेगुलेटर बंद नहीं किया मैंने
कितनी लापरवाह हो गई हूं मैं?
टिफिन भूल आई कोई बात नहीं
स्कूल का रजिस्टर साथ है, थैंक गॉड।
मुन्ना कितना रो रहा था आते समय
कल से  थोड़ा और जल्दी जगूंगी।
थोड़ा टाइम उसको भी देना है ना
सासू मां की दवाई तो रख आई हूं ।
बाबूजी के लिए सुगरफ्री चाय भी।
मुन्ना के पापा के कपड़े भी प्रेस हैं।
और उसकी फाइल भी तैयार है।
मैडम जी... किस सोच में डूबी हैं?
आपका स्टॉप आ गया, उतरिए।
कंडक्टर की तीखी आवाज व्यंग्य भरी।
और वो चौंक कर नीचे उतर आती है।
स्कूल पहुंच कर सामना करती है।
हेड की तेज घूरती नजरों का।
पांच मिनट लेट जो है आज।
" औरतें बराबरी की बात करती हैं
पर काम करने में सबसे पीछे"
पीछे से एक जुमला सुनने को मिलता है।
और जोरदार ठहाका भी मुफ्त में।
अनसुनी करके वो क्लास अटेंड करती है।
तभी आ जाता है फोन सासू मां का।
"अगर आराम करने से थोड़ी फुरसत मिल जाए,
तो लेती आना दवाई मेरे घुटनों की ।"
और वो अपने दिमाग में नोट कर लेती है।
तभी बीप बजी व्हाट्स एप से मैसेज की।
"आज सभी शिक्षकों की मीटिंग है
सभी शिक्षकों की प्रतिभागिता अनिवार्य है"
और वो ख़ुद को तैयार करती है मीटिंग के लिए।
पूछे जाने वाले संभावित प्रश्नों को दिमाग में रखकर।
बच्चों को टाइम टेबल  के अनुसार पढ़ाते,
और उनका होम वर्क चेक करते करते।
आ जाता है फोन पतिदेव का ।
"सुनो, आज मेरे कुछ दोस्त घर पर आने वाले हैं।
आते समय मटर और पनीर लेते आना।
और हां , मुन्ना की इंग्लिश की किताब भी।
अभी से उसे पढ़ाओगी तभी तो वो कुछ बनेगा।"
वो ठंडी सांस लेकर रह जाती है।
, ढाई साल का मुन्ना अभी से क्या पढ़ेगा?
लेकिन कहने की हिम्मत नहीं है उसमें ।
क्योंकि उसे बदले में मिल जायेगा।
ये चिरपरिचित अंदाज में कहा गया वाक्य-
"स्कूल में तुम्हें कौन सा हल चलाना है
बस कुर्सी ही तो तोड़ना रहता है,
सरकारी स्कूलों के टीचर तो मौज करते हैं"
और वो जुट जाती है फिर से अपने काम में,
क्योंकि लंच तो कब का खत्म हो गया।
और लंच के बदले मिले उसे आदेश और निर्देश।
पानी की बोतल से दो घूंट पानी उड़ेलती है गले में।
और जुट जाती है क्लास को पढ़ाने में।
ऑफिस पहुंच कर मीटिंग अटेंड की ।
वाशरूम में मुंह धोकर खुद को तैयार किया।
मीटिंग में सवालों के जवाब देने के लिए।
जैसे तैसे खत्म हुई मीटिंग,
और भागकर उसने बस पकड़ी और
थकहार कर अपने घर पहुंची तो,
  कर रहे थे इंतजार जूठे बर्तन और गंदा किचेन।
"अरे मेरी दवाई भूल गई , तुझे मेरी क्या चिंता
सारा दिन गप्प मारने से फुरसत मिलेगी तब ना"
गप्पे और मैं? शायद ये शब्द अजनबी है मेरे लिए।
और बिना खाए पिए वो लग गई काम में।
क्योंकि पतिदेव के दोस्त जो आने वाले थे ना।
मटर पनीर, छोले भटूरे, पूरी कचौड़ी, खीर,
रसगुल्ले दही, पापड़ रसमलाई ।
सब कुछ बनाकर दावत भी तो करनी थी ना।
रात एक बजे वो दो पूड़ी खाकर सोई ,
सुबह फिर 4 बजे उठने के लिए।


कहानी तो अभी बाकी है एक लेडी टीचर की,
शायद कई पन्ने भर जायेंगे पर खत्म नहीं होगी।
चलिए आज इतना ही ।
😊😊
संगीता शर्मा "प्रिया"