जल्द ही महारानी कैकेयी अवध के हिसाब से ढल गयी। उसमें महारानी जैसी उदारता भी थी, प्रजा से प्रेम भी तथा ऊंच नीच का कोई भेदभाव नहीं। अवध की रानी से इसी बड़प्पन की आशा थी। महल में तथा महल के बाहर भी सभी कैकेयी से संतुष्ट थे। सर्वत्र महारानी सुमित्रा के चयन की प्रशंसा होती।
अपने वचन के अनुसार महारानी सुमित्रा ने खुद को राजमहल की व्यवस्था तक समेट लिया। महल की पूरी व्यवस्था महारानी के हाथों में थी।
जब भी प्रजा के मध्य महारानियों का जाना होता, उस समय वह महारानी कैकेयी को तैयार करके भेजा करतीं। प्रजा जिसे ज्यादा देखती है, उसी को ज्यादा ध्यान रखती है। बिना किसी लिखित अनुबंध के महारानी सुमित्रा ने अपना अधिकार योजनानुसार कैकेयी को दे दिया।
जब भी कैकेयी महारानी सुमित्रा को बाहर चलने का अनुरोध करतीं, महारानी सुमित्रा किसी न किसी बहाने से टाल देतीं। कोई न कोई महल के कार्य में खुद की उपस्थिति आवश्यक बता देतीं। महारानी कैकेयी इसे महारानी सुमित्रा का अंतर्मुखी व्यक्तित्व समझती रहीं। जबकि यह वह गुप्त त्याग था जिसे महारानी सुमित्रा सहर्ष कर रही थीं।
महाराज अश्वपति का दूसरा अनुरोध भले ही महारानी सुमित्रा ने अस्वीकार कर दिया था, फिर भी इसमें उन्हें आपत्ति न थी। बस प्रजा के मध्य गलत संदेश न जाये। महारानी कौशल्या भी इस तथ्य से परिचित थी।
कैकेयी को महाराज के साथ समय बिताने के अधिक से अधिक मौके दोनों बड़ी रानियां प्रदान करतीं। दोनों कैकेयी को महाराज के साथ बाहर भी भेजती। कभी कभी महारानी कैकेयी महाराज के साथ आखेट पर भी जातीं। आखेट पर जाते समय वह उस काल के अनुसार वस्त्र पहनतीं। दोनों बड़ी रानियों का गुप्त त्याग कैकेयी के मन पर भी असर कर रहा था। हालांकि मंथरा भी महाराज अश्वपति को दिये वचन के अनुसार समय समय पर कैकेयी को स्वार्थ भरी बातें करतीं। छोटी छोटी बातों में कमियां दिखाती। कैकेयी को यह भी समझातीं कि बड़ी रानियों का यह प्रेम वास्तव में दिखावा है। पर कैकेयी के मन पर इन बातों का कोई प्रभाव न पड़ता। सच्चाई तो यह थी कि अब कैकेयी बड़प्पन की उस अवस्था पर थी जहाँ वह हर किसी की सलाह पर ध्यान भी न दे। उसका आदर्श महारानी कौशल्या व महारानी सुमित्रा बन चुकी थीं। कैकेयी का लगातार प्रयत्न यही रहता कि वह बड़ी रानियों के मन के प्रतिकूल कुछ भी न करे।
सभी के जीवन में एक बार वह क्षण जरूर आता है जबकि वह अपने प्रेम का प्रमाण देता है। एक तरफ प्रेम हो तथा एक तरफ धन दौलत। उससे भी आगे एक तरफ प्रेम हो तथा दूसरी तरफ जीवन। ऐसे हालात सभी के जीवन में आते हैं। फिर अक्सर मनुष्य प्रेम के राह को छोड़ देता है। धन, दौलत और जीवन को वरीयता देता है। प्रेम की परीक्षा में उत्तीर्ण ही कितने होते हैं।
महारानी कैकेयी के जीवन में भी एक ऐसा समय आया जबकि उन्होंने अपने प्रेम की परीक्षा को उत्तीर्ण किया। प्रेम पर अपना जीवन ही दाव पर लगा दिया। स्थिति यह थी कि उन्होंने अपना दाहिना हाथ ही अपने प्रेम के लिये खो दिया। विकलांगता को सहर्ष गले लगा लिया। संभावना यह भी थी कि वह जिनके प्रेम में सब कुछ बलिदान कर रही हैं, वह भविष्य में उनसे प्रेम ही न करे। जिस व्यक्ति की तीन स्त्रियां हैं तो वह विकलांग स्त्री को भला क्यों प्रेम करेगा।
पर इस तरह की बातें वही सोचते हैं जो प्रेम से बहुत दूर रहे हैं। जिनके लिये प्रेम मात्र प्राप्ति का साधन रहा है। जो प्रेम की वास्तविक परिभाषा से ही अपरिचित हों। प्रेम बस त्याग का दूसरा रूप है, इस सत्य से अपरिचित रहे हों।
धरती पर महाराज दशरथ का राज्य सर्वथा अजेय था। उनके पराक्रम की गाथाएं देवताओं तक व्याप्त थी। तभी तो देवता भी उनसे सहायता मांगते। पहले भी अनेकों बार उन्होंने देवताओं की सहायता की थी। कुलगुरु वशिष्ठ की तपोशक्ति से शक्तिशाली उनका रथ विभिन्न लोकों के भ्रमण में सक्षम था। पर इस बार जब देवताओं ने महाराज दशरथ से सहायता मांगी, उस समय शायद ही किसी को अनुमान था कि यह देवासुर संग्राम इतिहास में कैकेयी की वीरता और उससे भी अधिक प्रेम के लिये याद रखा जायेगा।
महारानी कौशल्या महाराज दशरथ को तिलक कर रणभूमि पर विदा कर ही रही थीं कि महारानी कैकेयी भी सैनिकों की तरह तैयार होकर कवच पहने, अस्त्र शस्त्रों के साथ महाराज दशरथ के बराबर खड़ी हो गयी। इस समय नारी शक्ति का रूप लग रही थी।
" जीजी। तिलक तो मुझे भी कीजिये। साथ ही आशीर्वाद भी दीजिये। मैं भी रण में महाराज का साथ देने जा रही हूं।"
कैकेयी के चेहरे पर उसका विश्वास तो था ही पर उससे अधिक वह भोलापन था जो उसकी पहचान थी। इसी से तो दोनों रानियाँ उसे बहुत प्रेम करती थीं। महारानी कौशल्या खुद को रोक न पायी। वैसे महाराज दशरथ को अनेकों बार रण के लिये विदा किया था। रण जो अनिश्चितता का द्योतक है। पर कैकेयी को रण पर विदा करने के लिये तिलक लगाने में उनके हाथ कांपने लगे। शायद यही बहनों का प्रेम है। महारानी कोशल्या ने कैकेयी को गले से लगा लिया। बहुत देर तक अपने अश्रुओं से उसके पीठ को गीला करती रहीं।
" क्या जीजी। आपको मेरी शक्ति पर विश्वास नहीं है। क्या आप मुझे रण के लिये अनुपयुक्त समझती हैं। क्या आप मुझे नारी होने के कारण कमजोर समझती हैं। नहीं। ऐसा तो कदापि ही नहीं है।"
" अरे ऐसा नहीं है। मैं तो उनकी चिंता कर रही हूं जिनका सामना अवध की महारानी कैकेयी से होगा। इस बार का यह युद्ध केवल तुम्हारे लिये याद रखा जायेगा। युगों तक देवता भी याद रखेंगे कि अवध की रानी ने किस तरह दैत्यों को रणभूमि से भगा दिया था। "
इस बार कैकेयी भी मुस्करा दी। महारानी कोशल्या ने महारानी कैकेयी को विजय तिलक लगाया। एक बार फिर से कैकेयी को गले लगाया। जीत के आशीर्वाद के साथ कैकेयी को महाराज के साथ विदा कर दिया।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

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