राकेश ने कहा _अरे तुम ज्यादा ही सोचती हो।
शेखर चला गया न ,परफ्यूम के बारे में थोड़ा पूछ लिया तो क्या, इसमें कौन सी डरने की बात है?

चलो आज घूमने का प्रोग्राम तो कैंसल ही हो गया है।
आज जल्दी आ जाऊं क्या? राकेश ने हंसते हुए पूछा।
आज न ही आओ ,आज मेरा मन अशांत है_शैव्या ने जवाब दिया।
पर राकेश कहां हार मानने वाला था ,उसने कहा तुम्हारा मूड खराब है ,उसे ठीक भी तो करना है ।आज तुम  खाना बनाने  के लिए परेशान न होना , मैं बाहर से खाना पैक कर लाऊंगा।

आज जब राकेश आया तो वो तो खुश था लेकिन शैव्या उदास थी,थोड़ी शरारत ,छेड़खानी के बाद उसका मूड बदला।
राकेश ने खाना शैव्या को सर्व करने को दिया, शैव्या मुंह बनाकर बोली_
कितने दिन हो गए, मैने मटन, चिकन नहीं खाया ,बहुत मन कर रहा। 

अब दो दिन बाद तुम्हारा पति आ  ही रहा है मटन,चिकन खिलाने_राकेश ने मजाक किया।
यही बात तो सता रही है , मैं अब मिल नहीं पाऊंगी ।
फिर अचानक गले लग कर फूट फूट कर रोने लगी ,राकेश मैं तुमसे दूर नहीं रह सकती ,मुझे तुम्हारी आदत हो गई है।मुझे कहीं दूर ले चलो ,जहां सिर्फ  मैं ,और तुम हों।

राकेश उदास हो गया_शैव्या मेरी जान ,तुम क्या सोचती हो कि मैं तुम्हारे बिना एक पल रह पाता हूं।आजकल तुम्हीं मेरे ख्यालों में ,सांसों में रोम रोम में समाई हो।
कमरे में लाइट म्यूजिक चल रहा था इतफाकन जो उनके जज्बात उस समय उमड़ रहे थे वही गाना बज रहा था।
(पुरुष की आवाज)
आंखों में हमने आप के सपने सजाए हैं
पलकें उठा के आपने सपने जगाए हैं।
(उसके बाद फीमेल आवाज)
सपना भी आप ही हैं,हकीकत भी आप ही हैं
बस आप आप ही मुझमें समाए हैं।
दोनों उस गाने के साथ खुद को रिलेट कर रहे थे।

दोनों खामोश थे ,एक दूसरे की बाहों में।खुद को तैयार नहीं कर पा रहे थे कि रचित के आने के बाद  कैसे रहेंगे एक दूसरे के बिना।
15 वें दिन रचित घर आ गया।आते ही उसने शैव्या को बाहों में भर लिया ,काफी दिनों बाद मिला था बहुत मिस किया था उसने शैव्या ।
लेकिन शैव्या को उसका आगोश ऐसा लग रहा था जैसे हजारों बिच्छू एक साथ डंक मार रहे हों।
उसने खुद को छुड़ाते हुए बनावटी हंसी दिखाते  हुए कहा _जाओ ,फ्रेश तो हो लो।
तब तक मैं किचन में कुछ काम निपटा लूं।
क्यों ? खाना बनाने वाला रामू कहां है?
अरे उसे मैंने ही छुट्टी दे दी थी।मेरा तो जानते ही हो डाइटिंग के कारण बहुत कम कुछ खाना होता है,क्या एक आदमी के लिए रखती ।
वैसे भी जानते हो ,अकेले में किसी गैर मर्द का घर में रहना ठीक नहीं लगता।कल वो आ जाएगा।

ओह माई डार्लिंग ,मैने तो ये सोचा ही नहीं था।कितनी समझदार हो।
रचित फ्रेश होने चला गया।
शैव्या धम्म से सोफे पर बैठ गई ,रचित की छुअन अब उससे एक दम बर्दाश्त नहीं हो रहा था।वह 
खुद को सामान्य करने की असफल कोशिश करने लगी।
उसने फोन में मैसेज देखा ।
राकेश के ढेर सारे मैसेज थे ।
उसने पढ़ना शुरू किया _
हैलो, मेरी जान 
कैसी हो?
शायद तुम पतिदेव की तीमारदारी में बिजी होगी।
आज तो तुम्हारा मिलन होगा , मैं यहां तन्हा ....।
तुम्हारी जुदाई में आंसू बहा रहा हूंगा।

अचानक रचित आ गया, शैव्या ने हड़बड़ी में फोन बंद किया।
रचित मुस्कुराते हुए बोला ,और किसका संदेश पढ़ा जा रहा है।
अरे किसी का नहीं,...वो नीतू का है।
ओह,तो हड़बड़ा क्यों रही हो ,सहज होते रचित ने कहा।

बात को दूसरी दिशा में मोड़ते शैव्या ने कहा ,और यूरोप से क्या क्या लाए हो।

हां ..।ज्यादा कुछ तो नहीं ,बहुत महंगा है ।चॉकलेट ,हैंड बैग तुम्हारे लिए और घड़ियां लाया हूं।
कल मम्मी पापा के पास चलते हैं ,तुम भी अपने भाई बहनों को गिफ्ट दे देना।

इच्छा न होने पर भी हामी भरनी पड़ी।रात को जब रचित बिस्तर पर आया तो शैव्या अनमनी बनी रही।
दूसरे दिन वो लोग दिल्ली गए ,रचित के मम्मी ,पापा बहुत दिनों बाद बेटे बहु को देख कर प्रसन्न हुए।
खूब हंसी मजाक हुआ ,सब खुश थे। शैव्या लौटते वक्त रचित के साथ अपने मायके गई,जीजा और दीदी साथ में महंगे चॉकलेट और गिफ्ट पर बच्चों की खुशी का ठिकाना न रहा।

उसके बाद वे वापस गुरुग्राम आ गए।

2 महीने बीते होंगे कि अचानक शैव्या का फोन रचित के माता पिता के पास गया कि मां पापा,रचित के ऊपर एसिड से हमला हुआ है ,उसका चेहरा झुलस गया है।
ये खबर सुन बूढ़े मां बाप के पैरों तले जमीन खिसक गई।

क्रमशः