सोचती हूं मैं ,
लिखना छोड़ दूं ।
शब्दों से मन भावों को
सजाना छोड़ दूं ।
रूठना मनाना,
सजना सवरना ,शब्दों में दिल के
अरमान सजाना छोड़ दूं ।
सोचती हूँ मैं लिखना छोड़ .....
अलंकारों में पंक्तियां सजाना
शब्दों की यह लड़ियां बनाना
शब्दों को कविता मोतियों में
पिरोना छोड़ दूं ।
सोचती हूं मैं .......
कोशिश भी की मैंने
एक-दो दिन हाथ भी रोके
पर मन मेरा कलम पर अटका रहा
आते-जाते मन भावों की
कड़ियां बुनता रहा ।
कागज खींच रहा था
कलम बुला रही थी
अंत में मन के आगे
मैं हार रही थी ।
कैसे मन के भावों को
मैं तोड़ दूं ।
मेरे शब्दों की ताकत को
कैसे रोक दूं ।
छोड़ सारी दुविधा
मैंने कलम पकड़ ली
कागज को चूम
फिर से शब्दों की राह ली .....
गरिमा राकेश गौत्तम
गौतम कोटा राजस्थान

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