अरे शिवानी कहाँ जाने की तैयारी हो रही है.. सासु माँ ने पूछा... दीदी के पास जा रही हूँ माँ.... शिवानी उत्तर देती हुई कलाई घड़ी बाँधने लगी.. आज रक्षाबंधन है.. आज घर पर रहो.. तुम्हारी दोनों ननदें भी शाम तक आएगी..भाई के शादी के बाद दोनों बहनों की पहली रक्षाबंधन है.. कल चली जाना..
रक्षाबंधन है इसीलिए तो जा रही हूँ माँ..मैं अपनी दीदी को ही राखी बाँधती हूँ.... लो अब नई बात सुनो.. अरे बहनें एक दूसरे को कब से राखी बाँधने लगी..
भाई को राखी क्यूँ बाँधते हैं.. वो हमारी रक्षा करे.. हमारी इच्छाओं को समझे... पूरे जीवन बहनों को इज्जत और मान दे.. है ना माँ.. शिवानी बहुत लाड़ से अपनी सासु माँ से पूछती है..
बिल्कुल सही कह रही हो तुम... तो मम्मी पापा के जाने के बाद यही सब मेरी दीदी मेरे लिए करती रही हैं...मेरी हर इच्छा पूरी करना..गलत सही में फर्क़ बता कर स्वयं की रक्षा स्वयं करना सिखाती रही... आप लोगों ने भी देखा मेरी शादी में दीदी मम्मी पापा की कमी महसूस होने नहीं दे रही थी.. खुद के ख्वाब छोड़ मेरे हर हर ख्वाब को तरजीह दिया है मेरी दीदी ने...
अब आप बताइए माँ..दीदी को राखी बाँधकर..सम्मान देकर. 
क्या गलत करती हूँ मैं...
नहीं बेटा...मैं गलत थी.. तुमने सच कहा.. जो मान दे... वही इस राखी.. इस रक्षाबंधन के लायक है...हकदार है... 
आरती झा(स्वरचित व मौलिक)
दिल्ली
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