इस नश्वर देह के साथ,
माँ करना हमारी आत्मा का श्रृंगार
मानव की नित परिवर्तित होती सोच का,
माँ करना उद्धार
आदर, प्रेम,सद्भाव, सच्चरित्र जैसे मूल्यों का,
माँ देना उपहार
कलयुग का हर प्राणी,
स्वार्थ और लोभ में फँसा, हुआ लाचार
चलती माया, खोती मानवता,
होता भावनाओं का नित दिन यहाँ व्यापार
इस नवरात्र में प्रभावित करना,
माँ प्रत्येक जन के विचार
माँ देना आशीष, कि बदले समाज,
सुधरे प्रत्येक प्राणी का व्यवहार
मुख पर तेज,अधरों पर मुस्कान लिए,
माँ कन्या बन आना हमारे द्वार
देना आशीष, सद्बुद्धि हमें,
और स्नेह अपार ll
स्वरचित एवं मौलिक
सुनीता कुमारी अहरी
नई दिल्ली

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