अनेकों बार जब पूरा संसार अपमानित करने लगता है, उस कष्ट को भी मनुष्य धैर्यपूर्वक झेल जाता है। मानों उसे किसी की बातों से कोई फर्क ही न हो।
अपनी मस्ती में जाता गजराज गांव के श्वानों के भौंकने की कभी चिंता नहीं करता है। उन्हें नजरंदाज कर देता है।
सत्य ही है कि वेदना हमेशा अपनों से मिलती है। दूसरों की बातें कुछ कष्ट तो पहुंचा देती हैं। पर मन को विदीर्ण नहीं कर पातीं। मन में हुए छोटे मोटे घाव तो उस मनुष्य की जिजीविषा से ही भर जाते हैं।
पर जब कोई अपना ही अवहेलना करने लगे, उस कष्ट को सहन करना असंभव सा होता है। पूरी सेना को हरा देने बाला योद्धा पुष्प से हार जाता है।
श्री राम के लिये वनवास मांगने के बाद कैकेयी ने वर्षों अपमान सहा। खुद उसके पुत्र भरत ने उसकी निंदा की। पति द्वारा भी अपमानित हुई। पर वह सारा अपमान तो उसकी साधना का साधन बन गया।
पर जिन श्री राम के लिये कैकेयी ने कुमाता का अपयश वरण किया था, उन श्री राम द्वारा की जाती अवहेलना को देख कैकेयी टूटने लगी। वेदना में उसका हृदय चीत्कार करने लगा।
बचपन से ही माता कैकेयी को मान देते आये, वनवास के बाद सीधे उन्हीं के पास आये, अपनी विभिन्न सफलताओं का श्रेय माता कैकेयी को देने बाले श्री राम द्वारा माता कैकेयी की अवहेलना। सत्य तो प्रतीत नहीं होता। पर प्रत्यक्ष को भला किस प्रमाण की आवश्यकता है।
क्या नरलीला करते करते खुद भगवान सामान्य मनुष्यों की भांति छोटी सोच के शिकार तो नहीं बन गये। अद्भुत था कि भगवान श्री राम द्वारा सामान्य नरों द्वारा आचरित क्षुद्रता ठीक उसी समय हुई जबकि उन्हें भगवान माना जा रहा था। नारायण का अवतार कहा जा रहा था। और नारायण नरों जैसा व्यवहार करने लगे। लगने लगा कि वह माता कैकेयी की अवहेलना कर रहे हैं। उनको सुन ही नहीं रहे हैं। उनकी बात का कोई मोल नहीं है।
माना कि कैकेयी मंथरा की बातों में आ गयी। पर श्री राम तो भगवान थे। उन्हें तो हमेशा समान भाव रखना चाहिये। यही तो उनके अवतार का उद्देश्य है। पर श्री राम माता कौशल्या के अनुरोध को सुन रहे थे, माता सुमित्रा के अनुरोध को सुन रहे थे पर माता कैकेयी के अनुरोध को सूनकर भी अनसुना कर रहे थे। इससे अधिक वेदना की क्या बात हो सकती है।
श्री राम को अयोध्या का राज्य सम्हाले अनेकों वर्ष बीत चुके थे। राजा के रूप में उन्होंने इतिहास रच दिया। अपनी नरलीला में एक बाद फिर से अपनी संगिनी का साथ खो बैठे। पर सत्य तो नहीं था। भला शक्ति कब शक्तिमान से दूर होती है। श्री राम और माता सीता का वियोग हुआ ही कब। जहाँ श्री राम के मन मंदिर में माता जानकी नित्य उपासना करतीं। वही माता जानकी का मन भी प्रभु श्री राम के तेज से ही जगमगाता। दो चिर प्रेमी दूर होकर भी नजदीक थे।
तीनों माताओं का मन, एक बार तीनों माताएं श्री राम के पास पहुंची। बहुत देर तक उन्हें देखती रहीं। विचार करती रहीं कि यही उनका पुत्र है जिसे संसार ईश्वर का अवतार कहता है। महर्षि और देवता इनकी वंदना करते हैं। लगता है कि मोह में पड़ हमने इनके सत्य को नहीं जाना है। सत्य तो यही है कि ये हमारे पुत्र नहीं है। अपितु पूरा विश्व की इन परमपिता की संतान है।
वास्तव में यह तो इनकी महानता रही है कि इन्होंने हमें माता के रूप में सम्मान दिया। हमारी फटकार को भी सहन किया।
यदि इन महान आत्मा का साथ भी यदि हमारे जीवन में ज्ञान का प्रकाश न ला पाये तो फिर यह जीवन ही व्यर्थ है। ज्ञान के बिना न तो यह लोक है और न परलोक।
माताओं ने आज अपनी इच्छा व्यक्त कर दी। आज तीनों माताएं माता तो नहीं लग रही थीं। श्री राम का मन वैचैन हो गया। संभवतः भगवान को भी जीवन में माता की आवश्यकता होती है। भगवान को भी अपने जीवन से माता खोने का भय लगता है। आज वही भय श्री राम को हो रहा था। आज तक माता के रूप में अधिकार प्रदर्शित करती आयीं तीनों माताएं शिष्याओं की भांति हाथ जोड़कर खड़ी थीं। उनका वह रूप ही श्री राम के मन में पीड़ा दे रहा था।
वास्तव में एक ज्ञान तो यही है कि संसार के निर्माता स्वयं भगवान का एक माधुर्य रूप होता है। उस रूप से ही वह भक्तों के साथ लीला करते हैं।
भगवान के ऐश्वर्य को न समझने बाले भी उनके माधुर्य रूप का ध्यान कर उन्हे पिता, पुत्र, माता, भाई, पति, स्वामी जैसे भाव रख पूज सकते हैं। ऐसे भक्तों को भी वही गति प्राप्त होती है जो कि भगवान के ऐश्वर्य रूप के जानकार ज्ञानियों को।
ज्ञानी अपने साधन से ऊंचाई की तरफ बढता है। इस साधन में गिरने की संभावना भी रहती है। पर भक्त तो खुद भगवान के भरोसे होता है। उनकी उन्नति भी भगवान के हाथों में होती है।
अनेकों बार ज्ञानी को भक्ति की आवश्यकता होती है। जब उसके साधनों से लक्ष्य प्राप्ति नहीं होती तब उसे भक्ति का सहारा लेना होता है।
पर भक्त को ज्ञान की क्या आवश्यकता। भक्त का सहारा तो खुद भगवान होते हैं।
अनेकों जन्मों की भक्ति के प्रभाव से तीनों माताएं खुद भगवान की नर लीला में उनकी माॅ बनी थी। आज तीनों भगवान से ज्ञान की याचना कर रही थीं। पर भगवान भला किस तरह अपने नियम को भूलते। माॅ को कैसे ज्ञान प्रदान कर सकते थे। माता जो खुद बच्चे की प्रथम शिक्षिका होती है, उसके गुरु कैसे बन सकते थे।
फिर माताओं का अनुरोध ठुकराया भी नहीं जा सकता था। आखिर श्री राम तो माता पिता के आज्ञापालन के रूप में ही विख्यात हुए थे।
आखिर बहुत सोच विचार कर श्री राम बोले।
" माताओं। एक पुत्र द्वारा माताओं को ज्ञान का उपदेश देना उचित नहीं है। फिर भी मैं आपको राह बता देता हूं। माता कौशल्या। आप गोशाला जायें। वहाॅ गायों के बछड़ों की वाणी को सुनें। बछड़े निश्चित ही बड़े ज्ञान की बात बोलते हैं।
माता सुमित्रा। आप सरयू नदी के तट पर विचरती भेड़ बकरियों के झुंड से ज्ञान प्राप्त करें। उनका स्वर ज्ञान की बड़ी व्याख्या करता है। "
माता कैकेयी इंतजार कर रही थीं कि श्री राम उन्हें भी ज्ञान की राह बतायेंगे। उन्हें भी कहीं भेजेंगे। पर ऐसा नहीं हुआ। श्री राम ने माता कौशल्या और माता सुमित्रा को राह बतायी पर माता कैकेयी की तरफ देखा भी नहीं। उनकी विनय को सुना ही नहीं।
गायों के बछड़ों की वाणी सुनकर अनेकों दिनों बाद माता कौशल्या आत्मा और परमात्मा को एक ही बताने बाले अहं ब्रह्मास्मि के सिद्धांत को समझ पायीं।
सरयू नदी के तट पर अनेकों दिनों तक भेड़ और बकरियों की वाणी को सुन माता सुमित्रा भी साधक की उन्नति में अहंकार त्यागने का महत्व समझ पायी।
और माता कैकेयी वेदना की बेदी पर जलती रहीं। श्री राम द्वारा अवहेलना को याद कर अश्रु बहाती रहीं।
जीवन में माता कैकेयी वास्तव में पहली बार आहत हुईं। पुत्र राम द्वारा की गयी उपेक्षा से दुखी हो गयीं।
पर कैकेयी अन्याय को देख शांत रहना नहीं जानती थीं। अपने अधिकारों को छीनना जानती थी। भले ही पुत्र ने उनकी अवहेलना की है। पर वह पुत्र को सही राह पर लाना जानती थीं भले ही पुत्र को सभी भगवान मानते हों। भगवान को भी उनकी भूल पर उलाहना दे सके, वही तो माता कैकेयी हैं। और यही उनकी महानता।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

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