छत पर लेटी सितारो को देख
सोच रही थी क्या वाकई
टूटते तारे भी इच्छा पूरी करते हैं
स्वयं का अस्तित्व लगा दांव पर
कैसे दर्द को सहते है
या ओरो के लिए जीते मरते
अपना सर्वस्व लुटाते है
आसमान में टिमटिमाते
सितारे लगते बहुत प्यारे
कौन जाने किसके लिए
क्यूँ चमकते ओर फिर मिटते है
लेकिन मैं जानती हूँ मर्म उनके मरने का
इन्सानो में ही कोई होगा अजीज उनका
इच्छा पूरी करने मरकर भी मरते हैं
ये सितारे बस यू ही चमकते हैं
अपनों की खातिर मरते हैं
लोग कहते है मरकर तारे बनते हैं
तारे बनकर फिर क्यूँ मरते हैं
बनने बिगड़ने का खेल अविराम
फिर क्यूँ चिन्ता मन की
आओ सितारे बन चमके ओरो की खातिर
मिटाकर खुद को सपने पूरे करते हैं
चलो दूसरो के लिए जीते हैं
कृष्णा की ✍️कलम से

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