मैं समय हूँ
चर रहा निरंतर
अविलंब, अनवरत
नहीं रूकता कोई प्रहर
ने बाधाएं कोई रोके मुझको
ना चट्टान कोई अड़चन बने
दिन रात ,हो चाहे धूप छाँव
कंटक भी ना रोक सके मुझको
हाँ लेकिन अपने साथ लिए कई
सुलझे,अनसुलझे, प्रश्नों की गठरी
मान,अपमान के घावों का दर्द
चलता रहता मन में पीड़ा हो गहरी
जो हो गया उसका मर्म
स्पर्श ना कर पाया भेद कोई
मैं बालू बन फिसलता रहा
हो चाहे कोई नया गम
ना रूका हूँ ना कभी झुका हूँ
नित नूतन आशाओं से बंधा हूँ
रोज सवेरा करने रात्रि लाता
आदित्य बन हर सुबह जगा हूँ
हाँ मैं समय हूँ,
जीवन की डोर थामे चला हूँ
सबके साथ होता हूँ
कभी छूटता भी हूँ
मुझे रोक नहीं सकती कोई आरजू
ना कोई जुस्तजू किसी की
बढने के लिए बना हूँ
मैं समय हूँ
कृष्णा की✍️ कलम से

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