तलाश थी सुकुं की ,हमे ना मिल सका
कश्ती का साथ भी तुफां ने कुछ इस कदर दिया

जाने क्या थी बात ,कभी गौर ना किया 
तडप भी क्या खूब थी ,इश्क़ कुछ इस कदर किया

जर्रे जर्रे पर लिखके नाम ,जीवन बीता दिया
मंजिल ही महबूब था,दूर जिस कदर किया 

मेरा ख्वाब था इतिहास में अपना नाम लिखाऊ
इतिहास खुद का बनके भी जिक्र उस कदर ना किया

मेरी तो जिन्दगी भी कितनी उथल पुथल थी 
एक रोज तुफान ने उजाड़ कुछ इस कदर किया
कृष्णा की✍️ कलम से