किसी की गहरी सांसो की आवाज सुनाई दे रही थी!
एकांशी उसी दिशा में बढ गयी, जिधर से कुछ हलचल महसूस हो रही थी!
दीवार का टेका लिए हुए एक परछाई नजर आ रही थी!
अब धूप भी कुछ चमकीली हो गयी थी!
कौन है उधर ठिठक गयी एकांशी, फिर अहिस्ता अहिस्ता आगे बढ़ गयी, ताकि उसके पैरों की धमक उसे सुनाई न दे "
कुछ ही पलो में उसके ठीक सामने पहुँच गयी!
वो एक नवयुवक था! एकांशी की नजर उसकी नजरों से मिली,
वो झेप गयी, पलकें खुद बाद खुद नीचे झुक गयी!
अब वो क्या बोले उसे समझ न आया, उसे लगा उसकी जुबान तालू में चिपक गयी!
वो नवयुवक भी कुछ अचकचा गया, अखिर इतनी खूबसूरत बला उसके सामने कहाँ से अचानक आ गयी!
वो एकांशी को, बिना पलकें झपकाये, बस निशब्द सा देखे जा रहा था! जो समाने पलकें झुकाये, पैर के अगूंठे से छत को कुरेदे जा रही थी!
अभि, भैया चलो, एक बच्ची उस नवयुवक के हाथों को खीचकर बोली, नीचे सारी रस्में हो रही है काकी सा ,ने बुलाया है!
हा चलो, उस बच्चों के साथ वो नवयुवक सीढियों की ओर बढ़ गया, एकांशी ने चैन की सांस ली, जैसे मुडी,, वो नवयुवक सामने ही खडा था!
आप बहुत खूबसूरत है! और एकांशी की ओर बढा, एकांशी दो कदम पीछे हट गयी!
वो युवक एकांशी के बगल से निकल कर मुंडेर की ओर बढ़ गया!
मुंडेर से निकली ईट पर कैमरे का कवर पडा था!
कवर उठाते हुए एक नजर एकांशी पर डाली, और एक मुस्कान के साथ तेजी से सीढियाँ ऊतर गया!
और एकांशी उसे देखती रह गयी! उसकी बडी, भरी भरी आँखे उसके अंदर तक उतर गयी!
कुछ तो हुआ था उसे, वो कहाँ जानती थी, की जिसे तलाशने आयी, वो उसे तालाश गया!
कितना कुछ बोलने आयी थी! पर बोलना तो दूर की बात नजर ही न उठा पायी!
एकांशी को लग रहा था, उसके अंदर से कोई चीज, उसे छोड गयी!
उसे लगा वो अब भी पीछे खडा उसे देख रहा है, वो जो महसूस कर रही थी! वो सही ही था, पास वाले घर की दीवार की ओट से दो आंखे उसका पीछा कर रही थी!
एकांशी पलटकर देखना चाहती थी! पर भय था! की यदि नही होगा तो, वो जो महसूस कर रही थी वो, ख्वाब भी चकनाचूर हो जाऐगा, जो वो अहसास इतना प्यारा था की वो बाहर नही आना चाह रही थी!
खुद में खोई खोई वो मुडेर के नजदीक कब पहुँच गयी! होश ही नही रहा!
एक ही कदम और की वो,,, किसी ने उसे खींच कर सीने से भीचं लिया, पागल हो, क्या करने जा रही थी!
वो तो मैने देख लिया!
नही तो पता नही क्या हो जाता, तुम नीचे गिर जाती, या हाथ पैर टूट जाते, जान भी जा सकती थी!
एकांशी मूढ सी उसे देखती रही, अभी हम कुछ पल पहले ही मिले हैं, और दूर जाने का भी सोच लिया, वो बिना रूके बोलता गया!
उसने ऊसके माथे को चूम लिया, अभी भी एकांशी चुपचाप उसे देखती जा रही थी!
तुम स्थिति को गभींरता से क्यू नहीं ले रही हो, उसने एकांशी के गाल को थपथपाया, होश में आओ, पर एकांशी, वो तो सपने में खोई थी! वो बाहर ही नही आना चाहती थी!
उसका अहसास उसे अच्छा लग रहा था!
तुम ठीक हो! हूँ, गरदन हिलायी एकांशी ने,
आसपास नजर डाली, कोई नजर न आया! उसने एकांशी की बिखरी लटो को अपने हाथों से पीछे करते हुए बोला अब जाओ!
नही तो किसी ने देख लिया तो खामखां, महौल बिगाड़ देगा!
एकांशी चुपचाप अपनी छत की ओर बढ गयी!
कमरे में जाकर पंलग पर कुछ देर शून्य में घूरती रही, वो क्या सच में मेरा हैं! मन ही मन मस्कुराई, उसने कितने अधिकार से,
अकैले मे शर्मा गयी एकांशी, उसके गाल कपाल तक रक्ताभ हो गये! रीमा ठाकुर, कृमश: भाग 3 आगे जारी """"

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