बाहर जोरदार बारिश शुरू हो चुकी थी।आसमान काले बादलों से घटाटोप था। रह रह कर लपलपाती बिजलियों की कड़कड़ाहट और बादलों की भयंकर गर्जना, ऐसा लग रहा था कि अब प्रलय अधिक दूर नहीं है।

  उत्तर काशी के एक घर में दुबकी अवंतिका के चेहरे की मुस्कुराहट और आँखों की चमक अब गायब होती जा रही थी।जिसका उसे बरसों से इंतजार था, वह पूरा होने वाला था लेकिन अब इस प्रलयकारी बारिश तो!उफ्फ!कई आते जाते सवालों को मन में ही झटक कर अवंतिका कमरे से निकल कर रसोई घर में पहुंची।

वहां उसकी माँ रात के डिनर बनाने में लगी व्यस्त थी। 

  अवंतिका एक पल को रुकी। मन में उठ रही आशंकाओं को मन में ही छिपाने की नाकामयाब कोशिश करने लगी। पर माॅ की आंखों से क्या छिपता है। 

  साधना एक पल को रुकी। आज वह अपनी बेटी अवंतिका को एक बार फिर से चुप कराना चाहती थी। पर रुक गयी। शायद वह जानती थी कि उम्र के पायदान के साथ साथ माॅ और बेटी का रिश्ता बदलता जाता है। बढती आयु के साथ माॅ बेटी की सखी बन जाती है। उसे सही और गलत बताने के लिये हुक्म से आगे बढकर मित्रता की सीढियाँ चढती है। पर फिर कुछ और आयु के बाद यह दोस्ती भी मंद करनी होती है। आखिर अब बेटी को उसके पलों के साथ छोड़ना होता है। 

  वे पल जो केवल और केवल अवंतिका की यादों का हिस्सा हैं।हर बार तेज बारिश में वह उन्हीं यादों के झंझावात से जूझती है। पर आज वह ज्यादा बैचेन है। मन ज्यादा ही अस्थिर है। वैसे किसी की नजर में आज चिंता का कोई कारण नहीं है। पर माॅ तो माॅ है। सब जानती है। सचमुच चिंता की बजह है। 

  " अरे। तूने अभी सतीश को फोन कर पूछा नहीं। वे घर पहुंचे या नहीं। ऐसे मौसम में कहीं रास्ते में अटक तो नहीं गये। साथ में उनकी माॅ भी तो है।" 

  साधना ने बात को घुमा दिया। अवंतिका भी यादों से बाहर आ गयी। सचमुच वह पागल ही है। सतीश को निकले कितना समय हो चुका है। उसे पूछ लेना चाहिये। 

  सतीश अवंतिका का मंगेतर, एक होनहार नवयुवक। जल्द ही दोनों की शादी होने बाली है। वैसे दोनों के मध्य प्रेम या पूर्व पहचान जैसी कोई बात नही है। वह तो सतीश की माॅ को ही अवंतिका कहीं पसंद आ गयी। आखिर केवल लड़की बाले ही लड़के की तलाश में नहीं भटकते। लड़के बालों को भी अच्छी लड़की की तलाश रहती है। किसी न किसी तरह वही उसके घर का पता कर चली आयी थी। फिर बातचीत.... ।लड़का और लड़की की रजामंदी.... वे सारे चोचले जो एक अरेंज मैरिज की निशानी है। वैसे अवंतिका को सतीश पसंद आया या नहीं। पर नापसंद करने जैसी तो कोई बात नहीं रही। विवाह तय होने के बाद से दोनों की हर रोज एक बार फोन पर बात तो हो ही जाती है। दोनों एक दूसरे की आदतों को समझने की कोशिश कर रहे हैं। 

  वैसे क्या यह सत्य है कि केवल वार्तालाप से दो एक दूसरे को समझ लेते हैं। शायद नहीं। अनेकों बार समझने को पूरी जिंदगी कम पड़ जाती है। न जाने कितने विश्वासपात्र ही धोखा देते हैं। 

  आज सतीश और उसकी माँ अवंतिका को उसके पसंद से विवाह की खरीदारी कराने आये थे। विवाह की साड़ियाँ, लहंगा, कुछ सूट, और भी कुछ ज्वैलरी भी। जब पहनना अवंतिका को है तो पसंद भी उसकी। हालांकि ज्वैलरी ज्यादा नहीं खरीदी। कुछ सतीश की मम्मी ने अपनी खुद की ज्वैलरी उसे भेंट की थी। 

  अवंतिका यथार्थ में वापस आ गयी। जल्द ही मौसम साफ हो गया। आज तो चिंता नहीं है। पर आगे चिंता होगी। अब अवंतिका जल्द विवाह होकर अपनी ससुराल चली जायेगी। फिर ऐसी स्थिति में उसे कौन सहारा देगा। 

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  अब अवंतिका अपनी ससुराल में आ चुकी है। वैसे ससुराल में ज्यादा बड़ा परिवार नहीं है। वह, उसका पति, उसके ससुर और सास। लगता है कि घर में सास की ही सबसे ज्यादा चलती है। हालांकि अवंतिका सास की ही मुख्य पसंद थी। फिर भी स्त्री स्वभाव हमेशा वर्चस्व चाहता है। 

   पुरानी यादें जरा फीकी हो चुकी थीं। नयी परिस्थितियों में नयी बातें जीवन का हिस्सा थीं। सचमुच वे लड़कियां सुखी होती हैं जो अपने पति के साथ अलग रहती हैं। जिनके पति कहीं बाहर नौकरी करते हैं, उन्हें यह सौभाग्य मिल जाता है। वे अपनी मर्जी की स्वामिनी होती हैं। ससुराल में रहने बाली लड़कियों की क्या हैसियत। भले ही ऊपरी तौर पर सब अच्छा दिखे पर अच्छा कब होता है। 

  समय बदलता है। फिर वही समय आ गया। आसमान में घने बादल छाये हुए थे। बिजली कड़क रही थी। मूसलाधार बारिश होने लगी। आज फिर अवंतिका को वही याद आ रहा था। दुर्भाग्य, आज उसे सम्हालने के लिये उसके पास माॅ न थी। 

  क्या हुआ था उस रोज। उसकी क्या भूल थी। यही कि उसने विश्वास किया था। 

   उस रोज भी घने बादल थे। बिजली कड़क रही थी। मूसलाधार बारिश हो रही थी। और अवंतिका संघर्ष कर रही थी, खुद के सम्मान की रक्षा के लिये। वह भी उसी से जिसपर वह विश्वास करती थी। जिससे वह प्रेम करती थी। राघव और उसके साथियों के इरादे जाहिर थे। दुष्ट कौरवों के मध्य द्रोपदी अपनी लाज बचाने को कृष्ण को पुकार रही थी। 

  कृष्ण आये पर कलियुग में कृष्ण खुद के प्राण भी नहीं बचा पाये। मोहन ने अपने प्राण गंवा दिये। तब अवंतिका को उसका प्रणय निवेदन समझ आया। 

  मोहन की मृत्यु हो जाने के कारण राघव को सजा मिली। पर एक सजा निर्दोष अवंतिका को भी मिल गयी। वह तो शायद सतीश और उसकी माँ को पता न था। नहीं तो वे भी उन अनगिनत में होते जिन्होंने अवंतिका का रिश्ता ठुकरा दिया था। 

  आज यादों के भंवर से बाहर निकालने के लिये उसके पास उसकी माँ न थी। लगता है कि गलत है। आज भी उसके पास उसकी सासू माॅ थी। जिसने अपने बड़े स्वर्गीय बेटे मोहन की चाहत को जानकर भी अपने घर की बहू बनाया। और सच जानकर  अवंतिका अपनी सास के गले लग गयी। ठीक उसी तरह जिस तरह वह अपनी माॅ के गले लग जाती थी। 
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'