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एक माँ की अभिलाषा थीं दिल में 
जैसे अब तक जीवन गुजरी
कभी धुप सी तो कभी छाव सी
कभी खुशी के राग़ गाये मिलके
कभी गम में सबके साथ पाये
कोई भी बात का मसला
बाहर न गया अब तक
ऐसे ही परिवार में एकता बनी रहे
बची है जीवन ज़ब तक
जैसे मेरी बेटियों ने घर संवारा है मन से
बहू भी लाऊंगी ऐसी
जो इस घर को अपना ले सच्चे मन से
कोई न मुश्किल होने दूगी
उसे बहू नहीं अपनी बेटी बनाकर
सीने से लगा के रखूगी
किया बड़े धूमधाम से बेटे की शादी
घर में मन चाही न बहू आयी
बेटी समझ कर माँ ने हाल जो पूछा
निकला स्वर उस बहू का ऊंचा
सून लो सांस मैं बेटी हूँ बड़े घर की
करुँगी न काम कोई तेरे टूटे इस घर की
कर दो बिदा कही भी अपनी लड़कियों को
इनकी बोझ न अपने सर लूगी
कुछ दिन जो समय यूँही बिता
घर में किसी के खुशी के कुछ पल भी न बिता
आगयी बहू जी की नयी फरमान
रहूँगी न इस घर में एक दिन भी यहाँ
चलो पतिदेव हम बड़े शहर में
सुकून नहीं मिलता तेरे इस टूटे घर में
कुछ सोचा न बेटे ने किसी के बारे में
निकल गया लेकर बहू को बड़े शहर
सारे सपने खाक़ हुई उस माँ की
बहू को छोड़ो बेटे भी रुका नाही
ज़रा भी न सोचा कैसे गुजर होंगी
माँ के साथ बहन की बसर कैसे होंगी
जन्म से लेकर बड़े होने तक
जिसको कभी कोई कमी न होने दी
आज वही बेटा माँ को बेसहारा कर दी
नहीं समझते समाज भी उस माँ की दर्द को
बल्कि दोषी ठहराने लगते है
बहू को रहबत न लेने दी तुम कैसी माँ हो
देख उस माँ की घुटन भरी आँसू
बेटियाँ खुद को मानने लगती है माँ की दोषी
क्यूँ ईश्वर देता है गरीब घर में बेटियाँ
जो जन्म से ही समाज के लिए होती है शापित
आज उस घर में गर बेटी न होती
तो एक माँ अपने बेटे बहू से यूँ दूर तो न होती
ख़ुश रहता पहले सी परिवार वह
माँ की अभिलाषा ऐसे अधूरी न रहते.....!!
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नैना.... ✍️✍️✍️