सोचती हूं कैसे नौ रूपों में नारी ढल जाती है,
 एक असहाय कैसे दुर्गा भी बन जाती है।

बिन पैसे के गरीब कन्या अफसर तक बन जाती है ,
है वह सरस्वती का ही रूप खुद करके दिखलाती है।

आए कोई मुसीबत घर में लक्ष्मी वो बन जाती है ,
दाल ,चावल ,आटे से  सोने के सिक्के निकालती है।

पति हो असहाय अस्वस्थ सावित्री बन जाती है,
 यम को जो मुंह की खिलाए अद्भुत रूप दिखाती है।

देश पे कोई आंख उठाए लक्ष्मीबाई बन जाती है,
 अहिल्या, इंदिरा ,कल्पना चावला देवी का रूप दिखाती है।

हो गर बात आत्म सम्मान की पार्वती बन जाती है ,
 यक्ष के यज्ञमें दे खुद की आहुति शंकर को यह पाती है।

त्याग,दया ,धर्म की देवी सीता यह कहलाती है ,
राज महलों के सुख को त्याग वन को यह अपनाती है।

इतनी गुणों से युक्त है नारी तभी नवदुर्गा कहलाती है,
 पल में देवी पल में काली यह रूप नए दिखलाती है।

कन्या पूजन का अधिकार उसी को मन से जो सम्मानकरे,
पूजे कंजक पेट में मारे तो फिर उनका क्या भगवान करें।

नव दुर्गा के नव दिन हमने कसम यही है, है खानी,
 शक्ति स्वरूपा बेटी की तुम कोख में ना दो कुर्बानी। 

स्वरचित सीमा कौशल
 यमुनानगर हरियाणा