उम्र के इस मोड़ पर रोटियां सेकना
करता है व्यक्त उनके दर्द की वेदना
माली की तरह सजाया था जिस बाग को
तिनका समझ उनको यो निकालना
लाठी के सहारे चलते थक से गए हैं
दो जून की रोटी को दिन भर खपते हैं
कंधों पर बैठाकर जिनको घुमाया
बेटे के कंधों को अब वह भारी हो गए हैं
आंखों में अब दिखता नहीं
बचपन का स्नेह पुराना
देखते देखते बदल गया बेटों का जमाना
गरिमा राकेश गौत्तम
खेड़ली चेचट ,कोटा राजस्थान

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