आवन कह गए अजहूं न आए। 
बाट निहारें चंचल अँखियाँ।। 
छल्ला   ,मुंदरी  पूंछें चुरियाँ ।
बैरन बन गई जा पैजनिया़ँ।। 
नींद न आवे याद सताबे।
फिर फिर देखूं अँगना अटरिया।। 
मन  मुसकात अधर चुप है गए ।
हँसी उड़ाबें  सारी सखियाँ।। 
दिन औ रात काटबो दूभर। 
मन ने लागू एकऊ घरिया।। 
रोज लगाऊँ नैनन कजरा।
बरसें सावन  भादों अँखियाँ ।।
आशा कासों कहूँ हिया की। 
श्याम छाँड़ गए भरी दुफरिया।। 
स्वरचित मौलिक अप्रकाशित सर्वाधिकार सुरक्षित डॉ आशा श्रीवास्तव जबलपुर