अभी तक आपने पढ़ा कि मारिया अपनी बेटी मिशेल की यादों में खो जाती हैं, और उसके बदलते हुए व्यवहार, रहनसहन को लेकर चिंता में पड़ जाती हैं । उसकी दोस्तों की संगत का गलत असर उस पर पड़ रहा है मारिया उसे समझाने का फैसला कर लेती हैं।
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मां साहेब.... मां साहेब....
अं... कौन? संयोगिता । आओ,आओ। सिस्टर मारिया अपने ख्यालों से बाहर निकल आईं।
आप किस सोच में डूबी हुई हैं? हम कब से आपको आवाज दे रहे हैं। आप सुन ही नहीं रही थी। आपकी तबियत तो ठीक है ना मां साहेब। संयोगिता ने उनके कंधे पे हाथ रख कर कहा।
सिस्टर मारिया मिशेल की यादों में इस क़दर खोई हुई थी कि उन्हें पता ही नहीं चला कि जाने कब से संयोगिता सिस्टर मारिया के पास खड़ी उनको बुला रही थी। वो उठकर बैठ गई और संयोगिता को हाथ पकड़ कर उसे अपने पास बिठा लिया।
अरे नहीं बेटा, ऐसा कुछ भी नहीं। बस थोड़ी सी थकान महसूस हो रही थी । इसलिए आंख मूंदकर बैठी थी। जरा आंख लग गई थी। तुम बताओ , रेस्ट कर चुकी? अब कैसा फील कर रही हो? उन्होंने संयोगिता से पूछा।
हमें अब पहले से आराम महसूस हो रहा है, कई दिनों की थकान दूर हो गई। आपका हम जितना भी धन्यवाद कहें कम होगा। आप सचमुच बहुत अच्छी हैं। अगर मेरी मां साहेब जिंदा होती तो बिलकुल आपकी तरह ही होती। संयोगिता ने धीरे से मुस्कुरा कर कहा।
बेटा, इसमें धन्यवाद देने वाली कौन सी बात है? आपने मुझे मां साहेब कहा है और हर मां अपने बच्चे के लिए अपनी जान तक देने के लिए तैयार रहती है । मैने तो तुम्हें सिर्फ अपने आश्रम और अपने हृदय में जगह दी हैं। सिस्टर मारिया के चेहरे पर ममता की चमक थी।
, हम राजपूत किसी का एहसान नहीं लेते । लेकिन आप तो हमारी मां साहेब हैं, इसलिए आपके सामने तो हमारा सिर हमेशा झुका रहेगा और हथेली फैली रहेगी। हमेशा कुछ मांगने के लिए। संयोगिता ने सिस्टर के आगे अपनी हथेली फैला दी।
सिस्टर को संयोगिता में मिशेल की झलक दिखाई दी। वो भी तो ऐसे ही करती थी। आज वो भले ही ऊंची पोस्ट पर पहुंच गई है और बहुत कम आना जाना होता है उसके पास, लेकिन आदतें आज भी वैसी ही हैं।कभी एकदम अक्खड़ तो कभी मासूम सी बच्ची।
क्या चाहिए मेरी बेटी को? एक बार आप कहकर तो देखिए। आपकी मां साहेब दुनिया की हर चीज आपके सामने रख देगी। सिस्टर ने संयोगिता के गाल छूते हुए कहा।
मां साहेब, हमें सोकर उठने के बाद बहुत जोर की भूख लगती है , हमें बीस रुपए दीजिए हमें भेलपुरी खानी है। हमारे पेट में आज युद्ध हो रहा है, पेट की आंतों में घमासान जंग शुरू है। मां साहेब दीजिए ना, हम मोहन से मंगवा लेंगे और हम मोहन के साथ बैठकर खायेंगे। संयोगिता बच्चों की तरह मचलते हुए बोली। उसे देखकर लग ही नहीं रहा था कि वो 24- 25 साल की युवती है। और कुछ महीनों की मेहमान है।
सिस्टर उसके लाड़ करने पर बहुत खुश हुई उन्हें मानो नवजीवन मिल गया हो , यही तो वो चाहती थी कि कोई उनसे जिद करे , फरमाइश करे। उनकी आंखों में चमक आ गई।
उन्होंने तुरंत संयोगिता को सौ रुपए लाकर दिए और कहा
संयोगिता, लीजिए सौ रुपए। मोहन को भेजकर भेलपुरी मंगवा लीजिए दो प्लेट ।एक मोहन के लिए और एक अपने लिए। बाकी के साठ रुपए हमें वापस लाकर दीजिए। खबरदार जो एक भी पैसा लिया तो। सिस्टर मारिया ने लाड़ से संयोगिता के कान पकड़े।
उई .... छोड़िए ना मां साहेब, दर्द हो रहा है हमें । हम आपको पूरा पैसा देंगे । बस एक लॉलीपॉप और लेंगे और कुछ नहीं।संयोगिता इतना कहकर बाहर की ओर भागी मोहन को बुलाने। सिस्टर मारिया उसकी हरकत देख कर मुस्कुरा दी।
ए मोहन, सुनो , मां साहेब ने हमें पैसे दिए हैं जाओ जल्दी से दो प्लेट भेलपुरी आओ एक अपने लिए और एक हमारे लिए। और हमारे लिए एक लॉलीपॉप भी लेते आना।और हां, अपने लिए लॉलीपॉप मत लाना। मां साहेब ने बाकी पैसों का हिसाब हमसे मांगा है। समझे । तुम्हारे लिए हमने इजाजत नहीं ली है उनसे। संयोगिता हाथ नचाते हुए बोली।
संयोगिता ने मोहन से भेलपुरी और लॉलीपॉप लाने को कहा तो वो भौचक्का होकर उसे देखने लगा। अभी कल की ही तो बात है इसके चेहरे पर चट्टान की तरह कठोरता थी और आज छोटी बच्ची सी मासूमियत और चंचलता। क्या राज़ है इसकी ज़िंदगी में? और ये मां को मां साहेब क्यों कह रही है? वो तो केवल मेरी मां हैं और मिशेल दीदी की मॉम। बड़ी आई मां साहेब कहने वाली। मां भी ना हर ऐरे गैर को अपनी बेटी बना लेती हैं वो इतनी सीधी जो हैं मैं मां से कह दूंगा कि सब पर भरोसा मत किया करें। उसका मन किया कि वो उसके हाथ से पैसे छीन ले और उसे भगा दे लेकिन वो जानता था कि वो मां से शिकायत कर देगी और मां फिर उसे समझाएंगी।
मोहन ने भुनभुनाते हुए उससे पैसे लिए और चल दिया भेलपुरी लाने के लिए। उसको यही दुख खाए जा रहा था कि मां ने कल की आई लड़की को पैसे दे दिए । आखिर एक अजनबी को क्यों सर पे चढ़ा रही हैं मां? मैं उनसे पूछूंगा जरूर। उन्होंने मुझे तो कभी लॉलीपॉप खाने के लिए पैसे नहीं दिए, और इसे तुरंत दे दिए, ये क्या छोटी बच्ची है क्या? इतनी बड़ी होकर लॉलीपॉप खाती है।
मोहन के जाने के बाद संयोगिता वहीं गेट के पास रखी बेंच पर बैठ गई और अपनी आंखों को बंद कर लिया। उसकी आंखों से आंसू के नन्हें नन्हें मोती गिरने लगे। कितना भी वो अपने मन को बहलाने की कोशिश करे पर उसका अतीत उसका पीछा नहीं छोड़ता। वो भूल जाना चाहती है सब कुछ । उन कड़वी यादों को अपने मन से खुरच खुरच कर निकाल देना चाहती है। लेकिन एक टीस सी हमेशा उसके अंदर उठती रहती है। संयोगिता आंखें बंद करके अतीत में खो गई और अपनी हवेली में मां साहेब के गर्भ में पहुंच गई ।
क्रमशः
लेखिका
संगीता शर्मा "प्रिया"

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