महंगाई जी, जब ,जब तुम आती हो
हम सबको बहुत सताती हो,
हमारे खून पसीने की कमाई को तुम
पल भर में उड़ ले जाती हो।

तुम तो दिन दोगुनी और रात चौगनी होकर,
मोटी ताजी होजाती हो,
हम को तो तुम चूस चूस कर
हमारा सारा खून पी जाती हो

ओ रे महंगाई थोड़ी मेरी बात तुम मान को,
क्यों नकसे इतना दिखलाती हो
अपनी सेहत का कुछ तो ख्याल
तुम जिम क्यों नही जाती हो।

मोटी सूरत लेकर तुम,
जहाँ देखो पाहुच जाती हो,
रोग लगाकर सबको आपना,
बस वही जम जाती हो।

हम भी कह कह कर हर गए है,
पर तुम हो कि शर्म भी नही खाती हो
हमारे लाचारी का तुम,
दिन रात फायदा उठती हो।

महंगाई तुम बहुत कठोर दिल की हो,
ताभी तो दिन रात सताती हो,
और हमारा पीछा छोड़कर
जाने तुम क्यों नही जाती हो।

✍️✍️✍️प्रितम वर्मा✍️✍️✍️💖💖💖💖💖💖💖💖💖💖💖💖💖💖💖💖💖💖💖💖💖💖