चार दिवारों के पिछे,
मरहम सी एक हसीना है..
उनकी लव्जों को सुनने की,
कालि घटा नगिना है...

बेपरवाह उनमुक्त गगन में,
मस्ती से झूम उठी है राग..
पवन की लुफ्त अदाओं से,
सन-सन बेहक रहीं अंदाज...

रात गुजर नहीं रही है आज,
कैसी मगन नयनों की उल्फाज...
बांह ठिठोरे लगी है 'पिड़ा'
मुझे गले लगा ले..वो मेरे यार...


    ✍विकास कुमार लाभ
            मधुबनी(बिहार)