पिछला भाग:--
रास्ते में देखा जिसको देखो वही घर के बाहर
समूह बनाकर बैठे बतिया रहे हैं....
सभी के घरों से उठता हुआ धुआं देखा....
अब आगे:--
थकान भी बहुत हो गयीथी सो अपने अपने बिस्तर 
बिछाए और पसर गये....हम चारों सखियाँ कृष्णा,  स्नेहलता, निधी और मैं हेमलता आपस में बात करने लगे.... स्नेहलता बोली...क्या गजब का खाना
बनाती हैं कमला काकी... कृष्णा हांँ यार मजा आ
गया...आलू भटे की सब्जी वा वाह और वो भी रसेदार गजब....ऐ निधी और क्या बनाया था काकी
ने...? पुड़ी खीर और चावल....
स्नेहलता बोली- अरे वहाँ आशा काकी ने भी यही 
बनाया था और स्वाद भी बेहतरीन था.....
ओह तब तो मिली भगत से ही बनाया...हम लोगों ने भी यही खाना खाया लक्ष्मी काकी के घर और बहुत बढ़िया बना था......
और तो ओर कल सुबह की भी दावत पक्की है...
और दूसरे घरों में कमला काकी पहले ही बता चुकीं हैं..... वहीं तीन घर छोड़कर आगे वाले घर में आने को बोला है.....

एक एक करके सभी घेरा बनाकर बतियाने 
लगे... हेमलता क्या गजब बर्तन चमक रहे थे 
यार!! देख कर ही दिल खुश हो गया....सोचो ये 
लोग कितनी मेहनत करते हैं....तभी तो बर्तन 
चमक रहे थे....खाना भी इतना स्वादिष्ट बनाया.... 
इनके घरों में तो कोई काम करने वाले नोकर 
चाकर भी नहीं हैं....सारा काम इन्हें खुद ही करना है....और चेहरे पर शिकन नहीं....ये है असली हमारा भारत देश.....

तभी परम बोला-अरे तुम लोगों ने एक चीज़ पर
ओर ध्यान दिया क्या...? सबके घरों से धुआं उठ 
रहा था...बात कुछ समझ आई.....
नहीं न....ये धुआं ही है जो वातावरण को शुद्ध करता है....तुम लोगों को मच्छर काटे क्या...?
नहीं न मच्छर होगें कैसे...? धुआं जो फैला है...

यही तो सब इनके स्वास्थ्य का राज़ है....कड़ी मेहनत करतें हैं... प्रकृति का भरपूर आनंद लेते हैं...
मेडम बोलीं- हेमलता चलो सो जाओ अब...सुबह जल्दी भी उठना है!!  कल और गाँव घूम लेंगे... फिर श्रमदान 
भी करना है...शाम को अपन जल्दी निकल चलेंगे......

अब दूसरे दिन सभी की नींद जल्दी खुल जाती है..
सो अपने नित्य कर्म से निवृत होकर बाहर निकले घूमने....थोड़ा ही आगे बढ़े थे सो एक दादी सी बाहर चौबारे में खड़ीं थीं...ऐसा लगा जैसे हम लोगों
की राह तक रहीं थीं.देखते ही...चलो आओ तन्नक
चाय सोयी पी ले फिर घूम लईयो......
वहीं चौबारे में मैंड़ें बनी थीं... वहीं हम सबको बैठा 
कर अंदर चली गयीं.......

थोड़ी देर बाद एक बहुरिया सी आई...घुंघटा डाले..
उसके हाथों में चमकती हुयी थाली में गिलास और
कटोरियों में चाय और साथ में बिस्कुट भी थे....
इतने सारे बिस्कुट देख कर लगा शायद!! हम लोगों 
के लिए ही मंगाए गये थे.....
बढ़िया अदरक डली चाय के साथ हम सभी ने बिस्कुट 
भी खाये....तभी कमला काकी भी आ
गयीं.... बोलीं बेटा ये जमुना दादी हैं पूरे गाँव की...
और ये हमरे गाँव की विमला भौजी हैं...दादी के पड़ोस 
में ही रहत आयें.....

फिर हम सब प्रणाम करके निकलने लगे...सो काकी बोलीं...खाना खावे बैंरा (समय)से आ 
जईयो...हम सब लोग बतियाते अपनी ही मस्ती में चले 
जा रहे थे....दो तीन बैलगाड़ी दिखीं जातीं...
तभी एक दद्दू ने आवाज लगाई...आओ बिटुआ
बैठो!! खैतन की सैर करिहयीं.....

अरे वा भई हमको तो मजा ही आ गया...वो कहते 
हैं न "सोने पे सुहागा"  हम सभी बैल गाड़ियों में बैठ गये....कितने अच्छे से सजे थे बैल इनके...उनके गले 
में बंधी घंटियों की मधुर आवाज़....मुझे फिल्म का 
एक गाना याद आ रहा था.....
मेरे देश की धरती सोना उगले.. उगले हीरे मोती..
मेरे देश की धरती.... बैलों के गले में जब घुंघरु जीवन 
का राग सुनाते हैं......

मतलब सब एक सपना सा लग रहा था...जीवन
की वास्तविकता... वास्तविक जिंदगी....
प्रकृति को कितने करीब से देखने का मौका मिला...
वास्तव में लगा जिंदगी तो गाँवों में ही बसती है....
हल्की हल्की रिमझिम रिमझिम बारिश की फुहारें
भी गिरकर... हमारे आनंद को बढ़ा रहीं थीं....
हमने कहा!! हम चलाएं दादा जी बैलगाड़ी....हाँ
हाँ बिन्नी (बिटिया) आप चलयी हो लयी चलाऔ...
मेडम-नहीं नहीं कोई रिस्क नहीं लेना हेमलता....
नाहीं मैडम जी...जै कछु नाहीं करि...खैतन की राह
पै ही चलहीं...कौनऊ डर नाहीं.....
क्रमशः--

कहानीकार-रजनी कटारे
        जबलपुर ( म.प्र.)