अपने आप में हम इस कदर
देखो खोने लगे हैं
जब से एकल परिवार के हम
हम होने लगे हैं
घरों के साथ ह्रदय भी हमारे संकुचित
अब होने लगे हैं
जब से बड़े बड़े शहरों में
हम रहने लगे हैं
इस भागम भाग में हम
जाने कहां भाग रहे हैं
वो मंजिल है ही नहीं कहीं
जिसे हम खोज रहे हैं
अपने विकास की खातिर
देश को छोड़ रहे हैं
अपनी ही जड़ों को खुद ही
हम काट रहे हैं
हाई फाई जीवन शैली से रिश्ता जोड़ रहे हैं
अपने देशीपन से नाता तोड रहे हैं
तभी तो परेशानियों में नित नई फंस रहे हैं
फिर भी तो हम देखो नहीं समझ रहे हैं
उन्नति हो रही है लेकिन परिवार खो रहे हैं
सारे रिश्ते नातों से हम मुंह मोड़ रहे हैं
हो सकता है ना हो महसूस अभी
लेकिन एक दिन एहसास हो ही जायेगा
कि हम खुद ही अपना वजूद खो रहे हैं
खुद के लिए ही कांटे बो रहे हैं
दादा दादी के प्यार से वंचित बच्चे हो रहे हैं
परिवार के महत्व को दौलत से तोल रहे हैं
अपनी ही महत्वाकाक्षाओं में इतना खो रहे हैं
अपने निशां खुद ही हम मिटा रहे हैं
माना कि आसान नहीं सब के करीब रह पाना
आज के समय की धारा में
तो क्यों ना एक सुंदर सा उदाहरण बन जाएं
दूर रहकर भी सबके दिलों में बस जाएं
रह ना सके अगर साथ तो कम से कम
त्योहार तो परिवार के साथ मना ही पाएं
परिवार के लिए थोड़ा सा वक्त निकाल पाएं
इस दौड़ती जिंदगी में कुछ पल सुकून के तलाश पाएं
एक बार फिर से साथ में
जीवन को जी पाएं
बच्चों को भी परिवार का महत्व
समझा पाएं
कविता गौतम...✍️

0 टिप्पणियाँ