बड़ी बेदर्द बेदिल हाय होती है।
सुख जाते है आंसू भी आखो में
आँखे बस सूखे ही सूखे रीति है
कोई घटाता है पेट जिम जाकर,
यहां पीठ से ही चिपक जाती है
किसी के घर सजी सोने की इंट
कही दोजून रोटी भी नही होती
कोई महलो में पलते है रईसी में
उनकी जिंदगी शानदार होता है
कोई फुटपाथों पे पालते गरीबी में
जिंदगी भी बदहाल हाय होती है
पालते किसी के कुते भी एसी मे
किसी के छत भी नही होती है
कोई पहनता है वस्र लाखो का
कोई तन ढकने को भी रोता है
बच्चे तरस्ते है किताबो के लिए
उनका बचपन भी छीन लेती है
देवी है नारायणी नारी जगमाता
वही मजबूरी में बिकती रोती है
कोई इलाज को भी तरस जाताहै
किसी को हर रोज जांच होती है
ये गरीबी है जालिम बेदर्द बड़ी
दुखो के बादल सी छाई रहती है
कष्टो के आंधियो तुफानो में यह
खुशियो को ही बहा ले जाती है
भूल जाते है लोग सुख की आस
ये गरीबी दुखो से सजी होती है
स्वरचित
प्रितम✍️✍️❤🔥❤🔥❤🔥❤🔥❤🔥❤🔥❤🔥❤🔥❤🔥❤🔥❤🔥❤🔥

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