दाताराम को वृद्ध तो नहीं कह सकते पर प्रोढ तो जरूर कह सकते हैं। आज चार दिन हो गये। दाताराम एक कमरे में बंद किसी का इंतज़ार कर रहा था। वैसे कमरे की वनावट अलग ही तरह की थी। एक बङे कमरे में से एक तरफ छोटी सी किचन बनी थी। कमरे में से ही एक स्टोर रूम निकला था। जिसमें इतनी जगह थी कि आराम से एक आदमी चारपाई बिछाकर सो सकता था। एक अटैच लैट्रिन बाथरूम था। पिछले छह महीने में दाताराम की जिंदगी बस इसी में गुजर रही थी। बाहर ताला लगा था। दाताराम का बेटा ड्यूटी पर जाता तो ताला बंद कर जाता। दाताराम को खिङकी से बाहर झांकने की भी मनाही थी। कमरे में खाने पीने का पर्याप्त सामान था। आखिर इस तरह अपने पिता को कैद करने बाले पुत्र के लिये किसी के मन में कितने गलत शव्द निकलेंगे। पर दाताराम ऐसे बेटे के लिये भी चुपचाप रो रहा था। तीन दिन और रात गुजर गये। बेटा वापस नहीं आया। कहाँ गया होगा। कैसी हालत में होगा।
" नहीं बेटे। जल्द वापस आ जाओ। तुम्हें कुछ हो गया तो मैं दुनिया को क्या मुंह दिखाऊंगा। श्रवण कुमार की कहानी सुनी थी। पर तू तो आज का श्रवण कुमार है। तेरे बिना मेरे जीवन का क्या मतलब।" दाताराम अकेला बुदबुदा रहा था। उसकी बुदबुदाहट सुनने बाला कोई न था। दाताराम की आंखों से झर झर आंसू बह रहे थे। सचमुच यह दाताराम का पुत्र मोह है या असल कहानी कुछ अलग ही थी। कई बार जो दिखता है, वह होता नहीं। और जो यथार्थ होता है, उसे जानकर अच्छे अच्छे दातों तले अंगुली चबाने लग जायें।
अचानक कमरे का ताला खुलने की आबाज आयी। दाताराम उठकर दरबाजे की तरफ भागा। एक लङकी भीतर आयी ।दाताराम एकदम ठिठक गया। छह महीने में उसने आज अपने बेटे रामसिंह के अलावा किसी और को देखा था।
अंजना ने दरबाजा बंद कर दिया। दाताराम के नजदीक आकर उसके पैरों में झुक गयी। पढी लिखी होने पर भी और इतनी बङी अधिकारी होने पर भी वह अपने संस्कार नहीं भूली थी। अंजना और रामसिंह ने जैसे ही मन में एक दूसरे को स्वीकार किया था, उन दोनों के मध्य कोई गुप्त बात नहीं रही। अंजना ने रामसिंह को बताया कि वह अपने पिता रामू को तलाशने यहाँ आयी है। अंजना जब छोटी थी तभी रामू इस देश में मजदूरी के लिये आये और गुम हो गये। वहीं रामसिंह की कहानी भी इसी तरह की थी। आठ साल पहले उसके पिता दाताराम यहाँ आये थे। पर वापस नहीं गये। रामसिंह पढने में चाहे जैसा हो पर शरीर से अच्छा था। सेना में भर्ती हो गया। इसे ईश्वर की कृपा कहेंगें कि उसे इस देश में भारतीय दूतावास की रखबाली के लिये भेज दिया गया। रामसिंह अपनी ड्यूटी करता और अपने पिता को तलाशता भी। अगर दिन की ड्यूटी थी तो रात में कंपनियों में तलाशता। रात की ड्यूटी के समय दिन में खाक छानता। आर्मी की ट्रैनिंग के दौरान दुश्मन को बेबकूफ बनाने की, वेष बदलने की तथा और भी अनेकों तरकीबें उसे सिखायी गयीं थीं। अंजना से एक कदम आगे बढकर उसने एक दिन अपने पिता को ढूंढ लिया। उसी दिन से दाताराम उसके कमरे में छिपा हुआ था। रामसिंह दाताराम को भारत भेजने की जुगत लगा रहा था। भारतीय मजदूरों के गायब होने का रहस्य का जीता जाता गवाह खुद दाताराम था।
" पिता जी। आप परेशान न हो। आपके पुत्र को चोट लगी है। अस्पताल में भर्ती हैं। पर कल तक घर आ जायेंगें।"
" पर तुम कौन हो बेटी।"
अंजना को देखकर दाताराम निश्चय नहीं कर पा रहा था कि उसपर भरोसा करे या नहीं। पर अंजना पर भरोसा न करने का भी कोई कारण न था।
" वैसे मैं भारतीय दूतावास की अधिकारी हूं। जहाॅ आपके पुत्र ड्यूटी करने जाते हैं। पर अब उससे भी अधिक आपकी पुत्रवधू हूं। उन्होंने ही मुझे आपके पास भेजा है। उन्हें आपकी बहुत फिक्र हो रही थी।"
अंजना की आंखों में सच्चाई दिख रही थी। फिर अंजना ने दाताराम के लिये खाना बनाया। जब दाताराम भोजन कर चुके तो अंजना दाताराम की पुत्रवधू से दूतावास की वरिष्ठ अधिकारी बन गयी। अर्थात अपने कर्तव्य को पूरा करने बैठ गयी।
दाताराम इस देश में हो रही गैरकानूनी गतिविधियों का साक्षात गवाह था। दरअसल धनी उद्योगपति ऊंची मजदूरी का लालच देकर परदेशियों को यहाॅ बुलाते। और फिर कभी जाने न देते। कागजों में उन्हें अपने देश का नागरिक दर्शा देते। पहले तो कुछ मजदूरी मिलती भी थी। पर अपना नागरिक बनाकर एकदम गुलाम बना लिये जाते। जिन्हें केवल खाना देकर दिन भर काम कराया जाता। एक कंपनी का मालिक दूसरी कंपनी के मालिक को अपने मजदूर बेच भी देता, जैसे कि पालतू जानवरों को बेचा और खरीदा जाता है। इस बात में सरकार भी कंपनी मालिकों के साथ है। तभी तो इस देश की कपनियों के बने सामान पूरे विश्व में इतने सस्ते बिकते हैं। आखिर मजदूरी बच रही थी।
अंजना के लिये अब करो या मरो का समय था। सही बात तो यह थी कि वह खुद कुछ भी कर पाने में असमर्थ थी। आखिर उसने एक विस्तृत रिपोर्ट, सभी प्रमाण व दाताराम जी के बयानों का वीडियो भारत के विदेश मंत्री, उनके सचिव को ई मेल कर दिया। खुद पर हुए हमले की जानकारी भी भेजी।
कुछ ही दिनों में स्थिति बदल गयी। भारतीय विदेश मंत्री ने विश्व पटल पर यह बात जोरों से उठायी। भारतीय सेना की बङी टुकङी भी कूच कर गयी। शक्ति में भारत किसी से कम नहीं। और जब बात देश की हो तो सेना का एक एक जवान कइयों पर भारी पङता है।
दूसरे कई देशों ने भी अपने नागरिकों की मांग शुरू कर दी। आखिर इस गैरकानूनी हरकत का ठींगरा कंपनी मालिकों पर फोङ दिया गया। अब हर रोज कंपनियों पर छापा मारा जा रहा था। भारतीय व अन्य देशों के मजदूरों को आजाद किया जा रहा था। अंजना भारतीय मजदूरों को रोज भारत भेज रही थी। आखिर एक दिन मजदूरों की टोली में उसे कोई परिचित सा लगा। यहीं हैं..। भले ही बचपन की याद न हो। पर माॅ के पास फोटो.. ।सचमुच यही शक्ल है। आयु अधिक है। शरीर कमजोर है। पर पहचान में कोई गलती नहीं है। भारतीय दूतावास की वरिष्ठ अधिकारी अंजना भागकर उससे लिपट गयी। एकदम छोटी बच्ची की भांति। मजदूर अवाक.. ।पहचानने की कोशिश करता रहा।
" बाबू.. ।मैं आपकी अंजू... । एक बार गये तो वापस आये ही नहीं। मैं खुद आ गयी आपको लेने।"
फिर अपनी बेटी अंजू को पहचान रामू भी रोने लगा। एक तो बेटी से मिलन की खुशी, ऊपर से इस विचार ने कि उसकी बेटी ने यह सब कर दिया जो कोई नहीं कर पाया , रामू का रुदन ज्यादा बढ गया।।
कहावत है कि अंत भला तो सब भला । एक तो विदेश की झूठी चमक फीकी हुई। रामू, दाताराम सहित अनेकों भारतीय अज्ञातवास खत्म कर वापस आये। अंजना ने जिस उद्देश्य के लिये भारतीय विदेश सेवा को चुना था, वह पूर्ण हो गया। उसने भारत सरकार को उसे भारत में ही रहकर आई ए एस, आई आर एस जैसी कोई अन्य भूमिका की मांग की। पर प्रतिफल में केंद्र सरकार ने उसे सचिवालय में प्रमुख अधिकारी नियुक्त कर दिया। आखिर इतनी होनहार अधिकारी की जगह तो सचिवालय में ही है। विदेश में खुफिया तरीके से मिशन ओपरेट करने के लिये रामसिंह को सेना ने न केवल सम्मानित किया बल्कि उसकी पदोन्नति भी कर दी। रामसिंह और अंजना की शादी हो गयी है। रामसिंह भले ही सेना की ड्यूटी पर दूर रहता है पर रामसिंह के पिता, माता, छोटी बहन सभी अंजना के साथ उसके सरकारी आवास पर रहते हैं। वैसे रामू और मुनिया भी अंजना के पास घूमने आ जाते हैं। पर ग्रामीण लोगों का विश्वास कि बेटी के घर में ज्यादा नहीं रहना चाहिये, अभी भी पहले जैसा ही है।
समाप्त....
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

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