मुकाबलों ने काम तमाम कर दिया
 कमियों को बे वक्त ही सरेआम कर दिया।

खुद ब खुद ही कमतर समझता है या खुदा गरीब,
 तंगहाली ने फाकों का गुलाम कर दिया।

देता नहीं कोई नोट अपने जेब से कभी ,
मशवरों का बोझ उसके नाम कर दिया।

दो कदम चलता है दस हाथ पीछे खींचे,
 जिम्मेदारियों ने जीना हराम कर दिया।

गैर मुकाबलों में खुश थे हम भी कभी 'सीमा',
 ना जाने क्यों खुशियों का कत्लेआम कर दिया।
 स्वरचित सीमा कौशलयमुनानगर हरियाणा