कर्तव्य और अधिकार एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। न तो कर्तव्य के बिना कोई अधिकार होता है। और न ही कर्तव्य परायण व्यक्ति की अधिकारों से उपेक्षा उचित है।
पर मानव जिसे ईश्वर की सर्वोच्च सृष्टि कहते हैं, अक्सर कर्तव्य और अधिकारों में सामंजस्य नहीं बना पाता है। एक तरफ कर्तव्यों का निर्वहन न करने बाले अधिकारों की याचना करने में पीछे नहीं हटते और दूसरी तरफ कुछ ऐसे भी होते हैं जो कर्तव्यों में अपना जीवन खपा देते हैं पर अधिकारों की तरफ नजर भी नहीं उठाते।
इन दोनों के अतिरिक्त कुछ तीसरे प्रकार के मनुष्य अति दुर्लभ की श्रेणी में आते हैं। ये कर्तव्य और अधिकारों में संतुलन बनाकर रखते हैं। न केवल खुद के लिये, अपितु अपने आसपास सभी के लिये, उनका यही दृष्टिकोण होता है।
महाराज दशरथ की दूसरी रानी होने के बाद भी महारानी सुमित्रा ने अपना वह अधिकार छोड़ दिया। पर रानी के कर्तव्यों से कभी भी पीछे नहीं हटी।
पर कैकेयी निश्चित ही तीसरे प्रकार के दुर्लभ व्यक्तित्व की धनी थी। जहाँ एक तरफ मंथरा भी उसे समय समय पर बड़ी रानियों के खिलाफ समझाती, दूसरी तरफ उसे अनायास अधिकार भी प्राप्त थे, इन सबके बाद भी कैकेयी अपने अधिकारों का प्रयोग महारानी सुमित्रा को उनके अधिकारों के संरक्षण में करतीं। ऐसा दो सगी बहनों के संदर्भ में भी दुर्लभ है। यदि घर में किसी एक बहन को दूसरी बहन पर ज्यादा महत्व दिया जाये उस समय भी अधिक अधिकार प्राप्त बहन भी अहंकार के मद में चूर ही होगी।
अनेकों बार किसी मनुष्य का एक आचरण उसके जीवन के सभी आचरणों पर भारी पड़ जाता है। जबकि पूरे जीवन के आचरण उसके व्यक्तित्व का निर्धारण करते हैं। पर वह मनुष्य केवल एक ही आचरण के कारण जीवन पर्यंत स्तुति या निंदा का पात्र बन जाता है। समाज कभी भी उसके मन की भावनाओं को नहीं देखता। उसके आचरण के पीछे की बातों को नहीं सोचता है।
चंदन का वृक्ष अनेकों विषधरों की संगत में भी अपनी शीतलता नहीं त्यागता। चंदन कभी भी अपने गुणों को नहीं त्यागता। यही चंदन का स्वभाव है।
पूरे जीवन महानता की राह पर चलती रही कैकेयी एकदम गिर कैसे सकती है। गिरे हुए व्यक्ति का पूर्व और भविष्य भी इतना उज्जवल कैसे हो सकता है।
भूत और भविष्य दोनों ही किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व का विश्लेषण करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्हें स्पष्ट करने का भी समय आयेगा। अभी तो इतिहास में स्वार्थ का प्रतीक मानी जाती रही पर महानता की सर्वोच्च सीढी पर खड़ी महारानी कैकेयी के जीवन के वह रहस्य प्रगट करने का समय है जो उसे महानतम सिद्ध करने के लिये आवश्यक हैं।
कर्त्तव्य पथ पर बढते मनुष्य की ईश्वर पग पग पर परीक्षा लेते हैं। उनके सामने लालाच का ऐसा भंवर प्रस्तुत करते हैं कि मनुष्य उसी के जाल में फस जाये।
इसी भंवर में किसी भी साधक की साधना की उच्चता की पहचान होती है। सामान्य लोग केवल खुद की सोचते हैं। खुद का अधिकार मिल जाने पर भूल जाते हैं कि किसी से उसका अधिकार छीना जा रहा है। कोई है जो कर्तव्यों के बाद भी अधिकारों से बंचित रह गया है। किसी अन्य के अधिकार के लिये भला कौन आवाज उठाता है।
पर कुछ ही ऐसे होते हैं जो खुद को मिला अधिकार भी तब तक स्वीकार नहीं करते जब तक कि सभी को अधिकार न मिल जाये। वे कुछ ही महान की श्रेणी में आते हैं।
महाराज दशरथ की सभी तीनों रानियाँ महान थीं तभी तो भगवान ने उन्हें अपनी माॅ माना।
महर्षि श्रृंगी के नैत्रत्व में आयोजित अनुष्ठान पूर्ण हुआ। पर पूर्ण होने के बाद भी एक नयी समस्या आ गयी। यज्ञ की खीर केवल सम भागों में ही विभक्त की जानी थी। उसके मात्र दो भाग किये जा सकते थे। कोई एक रानी उससे बंचित रहेगी। अनुष्ठान के परिणाम से मात्र दो ही रानियाँ माॅ बन पायेंगी।
पर जब केवल अधिकार प्राप्ति ही महत्वपूर्ण न हो अपितु अधिकारों का प्रदान करना अधिक महत्वपूर्ण हो तो ऐसा नहीं हो सकता है। हालांकि नियत समय पर महारानी सुमित्रा अनुष्ठान स्थल से हट गयीं। शायद उन्हें इस परिस्थिति का आभास था। पर न तो महारानी कौशल्या और न महारानी कैकेयी ने खीर का अपना भाग स्वीकार किया।
दोनों के ही पास महारानी सुमित्रा को उनका अधिकार प्रदान करने का बहुत अच्छा तरीका था। निश्चित ही खीर सम भागों में विभक्त हो सकती है। तथा दोनों रानियों के पास एक एक भाग दिया गया है। पर दोनों रानियाँ अपने भाग के दो हिस्से कर सकती हैं। एक एक हिस्सा महारानी सुमित्रा को दिया जायेगा। उसके बाद ही वे अपने हिस्से का सेवन करेंगी।
महाराज दशरथ का पुत्र प्राप्ति का अनुष्ठान एक बार फिर महानता की कहानी का साक्षी बना। महारानी कौशल्या और महारानी कैकेयी ने अपने भाग से आधा आधा महारानी सुमित्रा को दिया।
अधिकार प्राप्ति के बाद पुनः कर्त्तव्य प्रमुख हो जाता है। महारानी कौशल्या और महारानी कैकेयी के सहयोग से मात्रत्व का अधिकार पाने बाली महारानी सुमित्रा पुनः अपने कर्तव्य का निर्धारण कर चुकी थीं। माता ही पुत्र की प्रथम शिक्षिका होती है। महारानी सुमित्रा से शिक्षित उनके पुत्र भात्र प्रेम की ऐसी मिसाल बनेंगे जिन्हें युगों युगों तक याद रखा जायेगा।
क्रमशः अगले भाग में
दिवा शंकर सारस्वत 'प्रशांत'

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